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लिंगायत धर्म के लक्षण

✍ पूज्य श्री महाजगद्गुरु डा॥ माते महादेवि


लिंगायत धर्म के लक्षण इस प्रकार हैं

दो व्यक्तियों की उनकी अपनी अलग-अलग विशेषताएँ होती हैं। उसी तरह धर्मों के भी अपने अलग-अलग लक्षण होते हैं । लिंगायत धर्म के लक्षण इस प्रकार हैं:-

01. धर्मगुरू धर्मस्थापक विश्वगुरू बसवेश्वरजी
02. धर्मसंहिता वचन साहित्य
03. धर्म भाषा कन्नड़
04. देव नाम लिंगदेव
05. धर्म चिन्ह सृष्टिकर्ता कूडलसंगम देव का प्रतीक इष्टलिंग
06. धर्म क्षेत्र गुरू बसवेश्वरजी का समाधी स्थान कूडल संगम, शरण (संत) भूमी बसव कल्याण
07. धार्मिक वार्षिक समावेश शरण मेला
08. धार्मिक व्रत शरण व्रत
09. धर्म संस्कार इष्टलिंग दीक्षा
10. धार्मिक केन्द्र बसव (अनुभव) मंटप
11. धार्मिक विधि-विधान- गुरू-लिंग-जंगम (संत, महात्मा) की अर्चना (पूजा)
12. साप्ताहिक समावेश शरण संगम - सामूहिक प्रार्थना
13. पवित्र मास श्रवण (सावन) मास
14. धर्म ध्वज षट्कोण के बीच में इष्टलिंग का चिन्हयुक्त बसव ध्वज
15. परंपरा गुरू बसवेश्वरजी को आदिगुरू मानके उनसे चली आ रही शरण (संत) परंपरा जाति-वर्ण-वर्ग रहित धर्म सहित कल्याण राज्य निर्माण
16. धार्मिक बंधुत्व दूसरे धर्म के लोगों के साथ मानवता और भाईचारे का व्यवहार करना
17. धर्म का ध्येय जाति-वर्ण-वर्ग रहित धर्म सहित कल्याण राज्य निर्माण

इस तरह सिद्धान्त, साधना, दर्शन शास्त्र, समाज शास्त्र इन सभी नजरिये से लिंगायत धर्म स्वावलंबी है। केवल कुछ अंशों को छोड़कर अधिकतर विषयों में संपूर्ण भिन्न मतवाला लिंगायत धर्म हिन्दु धर्म का अंग बनकर, एक जाति या मत (सैद्धान्ति अभिप्राय) अथवा पंथ बनकर रहना असंभव है। जैसे एक राज्य में दूसरा राज्य नहीं रह सकता वैसे एक धर्म में दूसरा धर्म रह ही नहीं सकता ।

सांस्कृतिक साम्य

लिंगायतों का पहनावा, नामकरण और कुछ शिष्टाचारों का पालन इनमें हिन्दुओं से साम्यता दिखाई देती है । ईसाईयों ने सदा धर्मांतरण पर नजर रखी। आम तौर पर पिछड़ी जनजातियाँ उनमें भी दलित जनों में ज्यादातर ईसाई बनने की प्रक्रिया चल रही है। ईसाईयों के नाम कुछ अलग से याने विदेशी होने के कारण तथा वहाँ कुंकुम रोली का तिलक लगाने की प्रथा आदि नहीं होने से दलित लोग धर्मांतरण के लिए पीछे हटने लगे तो कॅथालिक पंथ ने बहुत बड़ा सुधार करके महिलाओं को कुंकुम-रोली का तिलक लगाने की अनुमति दी ! उसी तरह अब हिन्दू संस्कृति के नाम भी बच्चों को रखे जाते हैं। संस्कृति के बारे में सोचने पर पता चलता है कि भाषा और संस्कृति का निकट संबंध है और यहाँ भाषा तथा भौगोलिकता काम करती है। इसलिए हिन्दू संस्कृति कहने के बजाय भारतीय संस्कृति कहना अधिक उचित होगा। मुस्लीम महिलाएँ भी मंगलसूत्र और चूड़ियाँ पहनती हैं, तो क्या ईसाई और मुस्लिमों को हिन्दू कहा जा सकता है? उसी तरह लिंगायत भी नाम रखना, कुंकुम-रोली तिलक लगाना, चूड़ियाँ - मंगलसूत्र -छल्ला पहनना आदि में हिन्दू संस्कृति का ही आचरण करते हैं इसलिए उन्हें तात्विक और धार्मिक रूप से हिन्दू नहीं कह सकते। वचन साहित्य का अध्ययन न करने के कारण अपने धर्म का सही स्वरूप न जाननेवाले अधिकतर लिंगायत लोग (और मठाधिपति भी) अपने धर्म के विरूद्ध आचरण याने होम-हवनादि, बहुदेवतोपासना करते हुए जाति भेद - अस्पृश्यता को मानते हैं। केवल हिन्दूओं जैसा आचरण करने मात्र से उनके धर्म को कोई कलंक नहीं लगता । व्यक्ति भ्रष्टाचारी होने मात्र से संविधान कलंकित नहीं हो सकता। लिंगायत समाज में कुछ व्यक्ति अपने धर्म साहित्य का अध्ययन किये बिना आसपास के लोगों को देखकर उन्हीं की तरह आचरण करने के कारण ऐसी गलती करते हैं। अपनी वैयक्तिक दुर्बलता से किसी के मांसाहार करने मात्र से लिंगायत धर्म मांसाहारी धर्म नहीं बन सकता। उसी तरह किसी के गलत आचरण करने मात्र से वह गलती लिंगायत धर्म का अविभाज्य अंग नहीं बन सकती ।

मूलपाठ:
1) लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म - A book written by Her Holiness Maha Jagadguru Mata Mahadevi, Published by: Vishwakalyana Mission 2035, II Block, chord Road, Rajajinagar, Bangalore-560010.

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