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गुरू बसवेश्वरजी ने 'लिंगायत' नाम का नयां धर्म दिया

✍ पूज्य श्री महाजगद्गुरु डा॥ माते महादेवि


गुरू बसवेश्वरजी ने 'लिंगायत' नाम का नयां धर्म दिया

गुरू बसवेश्वरजी ने 'लिंगायत' नाम का नयां धर्म दिया तब जो मत-पंथ, जातियाँ पददलित जातियाँ अस्तित्व में थीं उन सबने इस धर्म का स्वीकार किया। गुरू बसवेश्वरजी के समकालीन संत संगमेश्वर के अप्पण्णाजी का यह वचन इस बात की पुष्टि करता है। वे कहते है:

हे प्रभो, छोड़कर, भूलकर अपने विष्णु को
कई वैष्णव बने लिंगभक्त,
हे प्रभो, छोड़कर अपने जैन धर्म को
कई जैन बने लिंगभक्त,
हे प्रभो, छोडकर, मिटाकर अपने कर्मों को
कई विप्र बने लिंगभक्त

इस तरह आये हुए कई समूहों में 'वीरशैव' भी एक ऐसा ही पंथ है। 'हिन्दू समाज इस पूर्वाश्रय के प्रभाव में आकर, दीक्षा के बाद भी अपनी पूर्व जाति भूले बगैर लिंगायतों में बनिया लिंगायत, पटेल लिंगायत, तेली लिंगायत, रजक लिंगायत, कुम्हार लिंगायत आदि नामों से संबोधित करते वक्त वीरशैव अपने आपको 'वीरशैव लिंगायत' कहते थे इतना ही नहीं बल्कि अपने आप को अन्य लिंगायतों से श्रेष्ठ मानकर श्रेष्ता के भाव से उन्मत्त होने के कारण शरणों (संतों) से टीका के पात्र हुए हैं। 'वीरशैव वंश में केवल पैदा होने से श्रेष्ठत्व नहीं आता ।' ऐसा कहके सिद्धरामेश्वरजी ने अपने एक वचन में टीका की है।

श्री गुरू बसवेश्वरजी के दादा परदादा आंध्र मूल के कम्मे ब्राह्मण थे । वे लिंगी ब्राह्मण थे। वे संचरण करते हुए आकर बागेवाडी प्रदेश में बस गये। आंध्र में प्रचलित इस संप्रदायवाले चरलिंग पूजक हैं। ब्राह्मण चरलिंगधारी गृहस्थों को माहेश्वर और ब्राह्मण संन्यासियों को जंगम कहके गौरव दिया जाता था। वे जनेऊ और चरलिंग (स्थावर लिंग का नन्हा रूप) इन दोनों को धाराण करते थे। केवल लिंगी ब्राह्मणों के लिए ही सीमित बने पूजा के हक को जाति-मत और स्त्री-पुरूष ऐसा कोई भेदभाव किये बिना सभी मानवों को देने की उत्कंठा क्रांति पुरूष बने गुरू बसवेश्वरजी में निर्माण हुई। लेकिन यह वैदिक शास्त्रों के अनुसार संभव नहीं था । शैव शास्त्र भी वैदिक शास्त्रों के प्रभाव तले ही कार्य कर रहे थे । इसीलिए गुरू बसवेश्वरजी वैदिक और शैव इन दोनों मार्गों की उपेक्षा करके बाहर आये और उन्होंने 'लिंगायत' नाम का नया धर्म दिया। यह बात गुरू बसवेश्वरजी के समकालीन संत लकडहार मार, याजी ने अपने एक वचन में स्पष्ट रूप से कही है। वे कहते हैं:

शुद्ध शैव को ओढ़े बिना, पूर्व शैव का आचरण किये बिना, मार्ग आराधना किये बिना, आदि शैव को अनुसारे बिना, रखके कर में अभेद्य लिंग, भरके नयनों में, मन के सिंहासन पे बिठाके, इष्टलिंगयोग बाकी के सारे मार्गों से भिन्न है यह बात इससे सिद्ध होती हैं ।

श्री हानगल कुमार स्वामीजी द्वारा अखिल भारत वीरशैव महासभा की स्थापना होने के बाद सबसे पहला अधिवेशन 1903 में धारवाड में हुआ । तब एक निर्णय लिया गया। उस समय लिंगायत समाज के जो मुखिया थे उनका लक्ष्य था, हिन्दु समाज व्यवस्था में अपने आपको ब्राह्मणों के समान सिद्ध करना । वह निर्णय इस प्रकार था ।

"वीरशैव मत निगम, आगम, उपनिषद और भाष्य द्वारा प्रतिपादित तत्वों से अनादि संसिद्ध है और श्री बसवेश्वरदेवजी इस मत के प्रचारक ही हैं स्थापक नहीं यह बात शिलालेख आदि प्रमाणों से सिद्ध होती है ऐसा यह महासभा निश्चित रूप से कहती है ।"

इस निर्णय के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

1. वचन साहित्य जैसा श्रेष्ठ साहित्य लभ्य न होने के कारण ।
2. बिना उजाले के गाढ़े अंधकार में जो हाथ आये उसे पकड़ लेते हैं, पानी की धारा के बहाव में तेजी से बहते हुए जानेवाला सहारे के लिए घास का तिनका ज्यों पकड़ लेता है त्यों, शूद्रत्व के प्रवाह में तेजी से बहनेवाला निगमागम का सहारा पाने का प्रयत्न करता है ।

इस निर्णय से कईयों को यह खुशी भी हुई होगी कि अपना धर्म बहुत पुरातन है। लेकिन जब वचन साहित्य उजाले में आने लगा, तब पुनर्चितन प्रारंभ हुआ । सन 1940 में दावणगेरे में हुए महासभा के अधि वेशन में एक और प्रस्ताव पारित किया गया ।

"लिंगायत और हिन्दू: लिंगायतों को अपने आप को हिन्दू नहीं कहलवाना चाहिए यह बात ध्यान में रखनी जरूरी है। लिंगायत 'हिन्दू' नहीं यहीं बहुतेरे मुखियाओं का अभिप्राय है । हिन्दू धर्म याने चतुर्वर्ण और चतुराश्रम का धर्म है। जैन, सिक्ख धर्मों की तरह लिंगायत धर्म भी एक स्वतंत्र धर्म है यह स्पष्ट है।

सन् 1904 से 1940 तक की कालावधि के बीच में बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव हुआ । इस बदलाव के कारणों का अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है।

19 वीं सदी में बहुत बड़ा सामाजिक परिवर्तन देशभर में होने लगा। हिन्दू समाज की बहुदेवतोपासना और अंधश्रद्धा के विरूद्ध एकदेवोपासना का प्रचार आर्य समाज, ब्रह्म समाज और प्रार्थना समाज इनके द्वारा होने लगा ।

सती सहगमन के विरूद्ध आंदोलन, विधवा विवाह के अवसर, अस्पृश्यता के विरूद्ध जंग आदि होने लगे तो वैदिक धर्म के दोष और दौर्बल्य लिंगायत मुखियाओं की समझ में आये, इतना ही नहीं बल्कि अपने समाज में अनेक प्रगतिपर विचार (ब्रिटीश शिक्षा के फलस्वरूप नहीं) सहज रूप से ही भीतर समाये हुए हैं यह जानके अचरज हुआ होगा। 'सी.पी. ब्राऊन' नाम के एक ब्रिटिश विद्वान ने 175 सालों पहले ही लिंगायत समाज के प्रगतिपर आचरणों के बारे में लेख लिखा है ।

कुछ भी हो आखिर में लिंगायत समाज जाग्रत होने लगा। प्रो. एम्. आर साखरे जी ने इसके बारे में 'लिंगधारण चन्द्रिके' नामक एक ग्रंथ की प्रौढ़ स्तर की प्रस्तावना लिखी है। इसमें लिंगायत धर्म की विशेषताओं का विवरण है। पुरोहितशाही का दखल इतना स्वार्थ पर होता है कि 'लिंगायत' इस श्रेष्ठ और स्वतंत्र धर्म को 'वीरशैव' इस छोटे से शैव प्रभेद की नामपट्टी चिपकाकर, समाज का दिशाभ्रम किया है यही इसका ज्वलंत उदाहरण है।

कर्नाटक के अत्यंत प्रतिभान्वित श्रेष्ठ व्यक्तियों में से एक थे डॉ. डी. सी. पावटे । वे शिक्षा-विशेषज्ञ और समर्थ प्रशासक बनकर कर्नाटक विश्वविद्यानिलय की स्थापना के समय उसके उपकुलपति बने थे। तब उस विश्वविद्यानिलय को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करवानेवाले वे धीमान् व्यक्ति थे। पंजाब राज्य के राज्यपाल बनकर वहाँ की राजकीय अस्थिरता को समर्थता से निभाकर पंजाब राज्य के अभ्युदय की नांदी उन्होंने गाई । दि. 23-12-1973 के दैनिक 'इंडियन एक्स्प्रेस' में डॉ. पावटेजी का एक लेखन, 'History of Lingayat Religion' प्रकाशित हुआ । उसका सारांश इस प्रकार है ।

"मैं पहले 9 साल तक वीरशैव महासभा का अध्यक्ष था । उस वक्त लिंगायत धर्म का इतिहास जानने के लिए कई ग्रंथों का अध्ययन करने का मौका मुझे प्राप्त हुआ। इन ग्रंथों में भी बसवेश्वरजी ही लिंगायत (वीरशैव) धर्म के स्थापक हैं ऐसा प्रस्ताबित किया गया है। मद्रास विश्वविद्यालय के इतिहास और पुरातत्व विभाग द्वारा प्रकाशित "दक्षिण भारत का इतिहास'' नाम का ग्रंथ मेरी नजर में विश्वसनीय है । वे उसमें इस प्रकार कहते है:

कल्याण राज्य पर राज करनेवाले कलचुरी वंश के राजा बिज्जल के प्रधानमंत्री बसवेश्वरजी थे। सामान्यतः उन्हें ही इस लिंगायत धर्म का स्थापक माना जाता है। लेकिन लिंगायतों में जो संप्रदायवादी हैं वे इसका विरोध करते हैं, इतना ही नहीं बल्कि वे कहते हैं कि यह बहुत प्राचीन है और शिवजी के पंचमुखों से उद्भव हुऐ एकोराम, पंडिताराध्य, रेवण, मरूल, विश्वाराध्य इन पंच आचार्यों ने इस धर्म की स्थापना की है । बसवेश्वरजी ने इस धर्म का पुनरुज्जीवन किया ऐसा वे बताते हैं, लेकिन ऊपर बताये गये पाँचों आचार्य गुरू बसवेश्वरजी के समकालीन थे। उनमें कुछ उम्र में उनसे बड़े तो कुछ छोटे थे यह वस्तुस्थिति है इसका ज्ञान हमें हुआ है।

दक्षिण के कई भागों में अपने अधिकार से जड़ें जमाने के तुघलक के प्रयत्नों को असफल करके मुस्लिम धर्म का योग्य प्रतिस्पर्धी बनकर इस नूतन धर्म ने राजकीय चालन शक्ति दी यह कोई छोटी बात नहीं ।

प्रथमतः सन् 1336 से 1485 तक विजयनगर साम्राज्य पर संगम वंश के राजाओ ने राज किया। अभी-अभी इस राज वंश के बारे में एक किताब लिखनेवाले इतिहास के एक प्राध्यापक ने प्रतिपादित किया है कि विजयनगर राज्य पर राज करनेवाले सभी राजा लिंगायत थे।

विजयनगर साम्राज्य के प्रारंभ से सन् 1920 तक सभी पंचाचार्य गुरू बसवेश्वरजी के अनुयायियों के साथ सारे मतभेद भूलकर सौहार्दता से ही रहते थे। किसी भी लिंगायत ने वेद अध्ययन के बारे में सिर नहीं खपाया था। सन् 1920 के बाद हाल ही में हमारी राष्ट्रीय नीति बनके अंगीकृत हुए बसवानुयायीयों के जन समूह से वे क्यों अलग हो रहे हैं। उन्हें किस पिशाच की बाधा हुई है यह मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है, लिंगायतों में अपने-आपको उन्होंने ब्राह्मण मान लिया हो तो इसके जैसी दुःखदायी बात कोई और नहीं ।

लिंगायत अगर अपने-आपको हिन्दू मान लेते हैं तो आज के कानून की नजर में उन्हें शूद्र वर्ग में परिगणित किया जायेगा । वास्तव में, जैन, बौद्ध और सिक्ख, धर्मों के समाजों की तरह लिंगायतों को भी हिन्दुओं से भिन्न धर्मी माना जाये ऐसी अर्जी भारत सरकार को इस शताब्दी के बीसवें दशक के प्रारंभ में दी गयी। लेकिन अभी तक इसके बारे में सरकार से कोई आदेश नहीं दिया गया है। फिर भी कुछ वर्षों से सरकार लिंगायतों को हिन्दू नहीं मान रही। हाल में भारतीय संसद ने हिन्दू विवाह कानून, हिन्दू अल्पवयस्क संरक्षणाधार कानून बनाते वक्त लिंगायत, बौद्ध-जैन, ब्रह्म समाज धर्मीयों को, उन धर्मों को भिन्न मानकर उन्हीं के लिए अलग कानूनों को बनाया है ।"

डॉ. डी. सी. पावटेजी का यह लेखन बहुत महत्वपूर्ण है यह बात पाठकों की समझ में निश्चित रूप से आयी होगी। पंचाचार्यों की काल्पनिक सृष्टि सन् 1920 के बाद की है यह इसपर से निश्चित होता है। लिंगायत हिन्दू नहीं हैं यह अभिप्राय पहले ही जन मानस में उदित हो चुका था, इतना ही नहीं बल्कि लिंगायत को एक अलग धर्म मानने की गुजारिश केन्द्र सरकार को प्रार्थना पत्र द्वारा की गई थी यह इस लेखन से पता चलता है। (एकता से न जूझना, 'वीरशैव' पद को साथ में जोड़कर लिंगायतों का स्वतन्त्र धर्म की मान्यता के लिए प्रयत्न करना, परस्पर में ही आंतरिक दल बनाना आदि कारणों से लगभग 90 साल कोशिश करने पर भी अभी तक सफलता नहीं मिली यह सचमुच शर्मनाक बात है-माताजी)

"Hindu law, N. R. Raghavachariar's Revised by Prof. S. Venkataraman, Publisher Madras Law Journal office, Mylapore, Madras-04, Page 32-33. Hindu Law now not a Law of all Hindus alone : A concept of Hindu Law as administered by the courts over the years show that it is not coincidental with religious beliefs. Apropos this aspect the Andhra Pradesh High Court observes "Hindu Law governed not only Hindus but also Sikhs, Jains and Buddists. It governed Lingayats a body of dissenters who deny the validity of caste distinctions."

ये उल्लेख बहुत महत्वपूर्ण है। लिंगायत धर्मी सिक्ख, जैन, बौद्धों की तरह सांप्रदायिक हिन्दू धर्म से अलग ही होते हैं; वे जाति पद्धति को नहीं मानते ये कथन ध्यान देने योग्य है। जिस विषय में सहमत हैं सिर्फ वही हिन्दू कानून लिंगायतों के लिए लागू होता है।

'Principles of Hindu Law' नामक कानून ग्रंथ में कुछ बातें दर्ज की गई हैं, पृ. सं. 697, 'Shudras' इस शीर्षक के अंतर्गत क्र. सं 627 |

Lingayats: The Lingayats who are originally Hindus are a body of dissenters and the founder of their religion was one Basava who was born about A.D. 1100. They acknowledge only one God, Shiva, and reject the other two of the Hindu Triad. They revere, the Vedas, but disregard the later com- mentaries on which the Brahmans rely. Their faith propose to be the primi- tive Hindu faith. Cleared of all priestly mysticisms, they deny the supremacy of Brahmans, and pretend to be free from caste distinctions, though at the present day caste is in fact observed amongst them. They declare that there is no need for sacrifices, penances, pilgrimages and fasts. The cardinal prin- ciples of the faith is an unquestioning belief in the efficacy of the Lingam. The image which was always been regarded as symbolical of the God Shiva is worn on body. Mysore, the southern Maharastra country and the Bellary District contain most of these Lingayats. Though the sacred thread is not worn by the Lingayats, a ceremony called Deeksha ought to be performed about their eighth year but as in the case of Upanayanam it is often per- formed much later. The sacred mantra is whispered in the ear by their Guru and this ceremony corresponds to Upanayanam among the Brahmans. Lingayats, whose only God is Shiva and who unacknowledge the authority of the vedas, are bound by Hindu law except in so far as it is modified by custom (60).

In the Madras case cited above the Lingayats of Madras were appar- ently not regarded as shudras. In Bombay state they are shudras, and not vaishyas [Gopal vs Hanmant (1879) 3 Bom. 273 Fakir gouda V Gangi (1898) 22, Bom, 277]

As to Lingayats in Mysore, see the under mentioned case (P1) [Sanganna gouda VS Kalkangouda a (60)

The Hindu Marriage Act के बारे में बताते हुए ऐसे कहा गया है। (P. 724) 2 (1) This Act applies :-

A) To any person who is a Hindu by religion in any of its forms or develop- ments, including a Virashaiva, a Lingayat or a follower of the Brahmo, Prarthana or Arya Samaj.
B) To any person who is a Buddist, Jaina, or Sikh by religion यह विवरण बहुत महत्वपूर्ण है।

1. लिंगायत हिन्दू ही होते तो उनका नाम अलग से लेने की जरूरत नहीं थी। ये बौद्ध, जैन, सिक्खों की तरह अलग ही हैं, इसी कारण उन्हें विशेष रूप से पहचाना गया है।

2. A virashaiva, a Lingayat कहकर अलग-अलग बताया गया है। Virashaiva or Lingayat ऐसा या Virashaiva / Lingayat ऐसा नहीं लिखा गया | Hindu Marriage Bill में ऐसा कहा गया है।

"At present, Hindu Law applies (i) to Hindus by birth, and Hindus by reli- gion, that is to say, to converts and re-converts to Hinduism. (ii) to illegiti- mate children where both parents are Hindus. (iii) to illegitimate children where mother is a Hindu and children are brought up as Hindus. (iv) Brahmos, Arya Samajists, Lingayats and to persons who may be regarded as Hindu unless they can show some valid local, tribal or family custom to the con- trary and (v) to Jains, Sikhs and Buddhists.

हिन्दू विवाह कानून में जैन, सिक्ख और बौद्धों के आचरण के साथ 'लिंगायत' इस नाम का बार-बार उल्लेखन किया हुआ देखते हैं तब इसपर से 'लिंगायत', हिन्दू आचार संहिता से अलग ही है यह स्पष्ट होता है ना?

पिता हिन्दू और माता ईसाई थे और इन दोनों ने विशेष विवाह कानून 1945 के अनुसार विवाह किया था। उनके बेटे को अविभक्त कुटुंब की जायदाद का हक पाप्त हो सकता है क्या? यह प्रश्न सामने आया तो सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने इस प्रकार फैसला दिया है।

हिस्सेदारी के बारे में हिन्दू कानून इस तरह कहता है: पिता ही परिवार का मुखिया होता है। जन्म से ही बच्चों को उत्तराधिकार का हक प्राप्त होता है। लेकिन यह नियम (iv) जैन, बौद्ध, सिक्ख, नम्बुद्री ब्राह्मण और लिंगायतों को यह लागू नहीं होता ।

(v) इसी तरह जन्म से ही हिन्दू होने पर भी उसे त्यजनेवाले को, त्यजने के बाद पुनः विधिवत् वापस न आनेवाले को अन्वय नहीं होता ।
(vi) यह फैसला तिरूकनगौड (v/s) शिवप्पा (1943) बाम्बे, 706, 45 Bom L. R. 992
हिन्दू कानून में पुनः पुनः लिंगायत समाज का उल्लेखन किया हुआ देखते हैं तो इस पर से यह सिद्ध होता है कि लिंगायत धर्म की विचार-आचार संहिता अलग ही है; सिर्फ कुछ अंशों में जैसे विवाह का कानून, जायदाद का हक आदि विषयों में समान अंश होते हैं।

हिन्दू कानून कुछ विषयों में लागू होता है, केवल इसलिए जैसा कि डॉ. चिदानंद मूर्ति प्रतिपादित करते हैं लिंगायत हिन्दू धर्म का अंग नहीं बन सकता। उदाः आगम के 36 तत्वों को वचन साहित्य सृष्टि का रचना क्रम कहते वक्त मान्य करता है। केवल इस कारण पूरे आगमों की विचारधारा को वह मानता है ऐसा नहीं है । इस्लाम की तरह परमात्मा एक है और वह सर्वशक्तिमान है ऐसा कहने मात्र से इस्लाम के सभी तत्वों और आचरणों को लिंगायत धर्म मानता है ऐसा नहीं है। किसी व्यकित की नाक दूसरे व्यक्ति की नाक से मिलती-जुलती हो तो दोनों व्यक्ति एक ही नहीं हो सकते। उसी तरह हिन्दू-लिंगायत अलग-अलग हैं और लिंगायत - वीरशैव भी अलग-अलग ही हैं। इस ग्रंथ की रचना जब वचन साहित्य अभी प्राप्त नहीं हुआ था तभी हुई थी। उस वक्त प्राप्त साहित्य था केवल भीम कवि का बसव पुराण और विरूपाक्ष पंडित का चन्नबसव पुराण । एक महत्वपूर्ण बात लेखक कहते हैं, "Much of the good effected by the founder has thus been counteracted, and the Lingayat is gradually becoming more and more like his orthodox Hindu brother. In proof of this tendency it may be noted that, at the time of the census of 1891, there was numerous representations from Lingayats claiming the right to be described as Virashaiva Brahmans. Further, on the occasion of the census of 1901, a complete scheme was sup- plied to the census authorities professing to show all Lingayat sub-divisions in four groups. Viz., Brahman, kshatriya, Vaishya and Shudra. It is noted, in the Mysore census Report 1891, that the Lingayats interviewed the Maharaja, and begged that their registration as Virashaiva Brahmans might be directed. The crisis was moved by his highness the Maharaj's Govt. Passing orders the effect that the Lingayats should not be classed as shudras but should be separately designated by their own name, and that which they were at liberty to call themselves virshaiva Brahmans." (P 252-253).

The Lingayat faith appears to have spread very rapidly after Basava's death; within 60 years of founder's death it was embraced from Ulavi near Goa to Sholapur, and from Balehalli to Sivaganga."

सन् 1891 की जनगणना के वक्त कुछ लिंगायत प्रमुखों ने लिंगायतों को 'वीरशैव ब्राह्मण' मानकर वर्गीकरण किया जाए और 1901 की जनगणना के वक्त लिंगायतों को चतुर्वर्णों में वर्गीकृत किया जाए ऐसी माँग की थी । यह कितना बड़ा अपराध उन्होंने किया! इसी कारण बौद्ध, जैन और सिक्खों ने जो स्वतंत्र धर्म की मान्यता बड़ी आसानी से पायी वह लिंगायत धर्म को नहीं मिल पायी। उसी तरह धार्मिक अल्पसंख्यकों की सहुलियत भी लिंगायत समाज को नहीं मिल पायी। ये कैसा अन्याय लिंगायत प्रमुखों ने समाज के साथ किया। वीरशैववादियों ने खुद ब्राह्मण बनने के स्वार्थवश पूरे समाज के साथ द्रोह किया है ऐसा कहेंगे तो यह गलत नहीं होगा । क्योंकि आगमोक्त वीरशैव मत और वचनोंक्त लिंगायत धर्म इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है।

यह कृतक ब्राह्मणत्व पाने के चक्कर में लिंगायतों (वीरशैववादियों) ने कुछ कम पापड़ नहीं बेले ।

1. अपना धर्म बसवेश्वरजी से स्थापित नहीं हुआ बल्कि पहले से ही था। निगमागमों से यह स्थापित हुआ है ऐसा तर्क उन्होंने किया ।

2. यह धर्म वेद विरोधी है, ब्राह्मण विरोधी नहीं है । केवल प्राणी हत्या करनेवाले यज्ञ-यागादि, कर्मकाण्डों का विरोध करता है लेकिन ज्ञानकाण्ड का नहीं; मध्वाचार्य और रामानुजाचार्य की तरह कुछ का स्वीकार किया है और कुछ का निराकरण किया है ऐसा प्रतिपादन किया ।

3. लिंगायत धर्म-समाज में भी जातियाँ हैं । इसको साबीत करने के लिए अनेक संस्कृत श्लोको का उन्होंने उल्लेखन किया । (पृष्ट सं. 260) इसके बारे में थर्स्टन् कहते हैं: It is unnecessary to weary the reader with the texts and their translations. The object in referring to these latter day ac- counts of the origin of the Lingayats is to show the modern tendency of tradition to bring Lingayatism into line with Brahmanistic Hinduism. The works referred to by the learned authors appear to be Sanskrit writings of not more than 500 years ago, and cannot be taken as proof that the Lingayat religion is of greater antiquity than the 12th Century, or that it has always been observant of caste distinctions. The persistence with which these points are advanced at the present day is, however, worthy of careful notice. If Lingayatism was an island thrown up within the "boundless sea of Hindu- ism," it would appear that the waters of the ocean are doing their utmost to undermine its solid foundations." (P.260)

ग्रंथकर्ता ने उल्लेखित की हुई कुछ बातें अब जाति भेद करनेवाले लिंगायतों की आँखें खोलती हैं । (पृ. सं. - 267)

"अभी हाल ही में अन्य जाति के लोगों ने लिंगायत धर्म का स्वीकार किया । उन्नीसवीं सदी के अंत में धारवाडं जिले के तुम्मिनकट्टी में बहुत-से जुलाहा जाति के लोगों ने लिंगायत धर्म का स्वीकार किया। उज्जैन से आये एक जंगम (संत) ने उनको दीक्षा दी। उनको 'कुरुहिनवल' याने सृष्टिकर्ता परमात्मा का चिन्ह इष्टलिंग पहननेवाले ऐसा कहा जाता है । उन्होंने अपनी पूर्वाश्रम की जाति से सारे सामाजिक संबंध तोड़ दिये हैं।" गुरू बसवेश्वरजी के धर्मोपदेश के अनुसार अत्यन्त निम्न जातिवाले भी इस धर्म का स्वीकार कर सकते हैं और अन्य लिंगायतों के साथ समान स्थान पा सकते हैं। 'अब्बे डयुबाइस्' लिखते हैं, "अत्यन्त निम्न श्रेणी का अस्पृश्य भी लिंगायत धर्म का स्वीकार करता है तो वह किसी ब्राह्मण से भी कम नहीं हैं ऐसा माना जाता है। जहाँ इष्टलिंग रहता है वह शरीर कूडलसंगम देवलय बनने के कारण वहाँ कोई जाति भेद, स्तर का भेद और वर्ग भेद नहीं किया जाता। लिंग भक्त बने अस्पृश्य की कुटिया बिना इष्टलिंगवाले राजा के राजमहल से भी श्रेष्ठ है ऐसा माना जाता है। यह धर्मस्थापक गुरू बसवेश्वरजी का आशय है ।" थर्स्टन कहते हैं:

"लेकिन उज्जैनी मठ के जंगम कहते हैं कि मातंग भंगी आदि अस्पृश्य जातियों के लोग लिंगायत नहीं बन सकते।" (पृ. सं. - 267) (उज्जयिनी मठ पीठ के स्थापक शरण (संत) मरूलसिद्धजी ही मातंग जाति के थे इस सत्य को ये मठवाले भूले हैं यह बिल्कुल स्पष्ट है ।) इस तरह वीरशैववादियों से ही लिंगायत धर्म अपनी चलनशीलता खो बैठा ये इससे साबीत होता है। गुरू बसवेश्वरजी ने ब्राह्मण से मोची तक, पुरोहित से भंगी तक सभी को धर्म संस्कार दिया यह बात सूर्य प्रकाश की तरह प्रकाशमान वचन साहित्य के द्वारा स्पष्ट नहीं होती क्या? इस पृष्टभूमि पर जल्द से जल्द लिंगायत वीरशैव का संपर्क नहीं तोड़ेगा तो अपना विनाश खुद ही कर लेगा। सिद्धान्त शिखामणि ग्रंथ के मूल श्लोक और व्याख्यानवाले पृ.सृ. 108 पर परिच्छेद 9 के श्लोकों की सूची दी गई है। श्लोक क्र. 28, 29, 30 देखिये । "वीरशैव ब्राह्मण, वीरशैव क्षत्रिय और वीरशैव वैश्यों को अपनी-अपनी जातियों के लोगों के घरों में ही भोजन करना चाहिये । अन्यों के घरों में भोजन नहीं करना चाहिए । वीरशैव | क्षत्रिय, वीरशैव वैश्यों को वीरशैव ब्राह्मणों के यहाँ भोजन करना चाहिये, लेकिन ब्राह्मणों को क्षत्रिय, वैश्यों के यहाँ भोजन नहीं करना चाहिए ।" लिंगायतों को बिल्कुल ही मंद मति बने बिना इस श्लोक - व्याख्यान के बारे में सोचना चाहिए। यह पुस्तक दि. काशीनाथ शास्त्री द्वारा संपादित सिद्धान्तशिखामाणि, मैसूर की पंचाचार्य इलेक्ट्रिकल प्रेस में मुद्रित की गई है। एक तो, यह वीरशैव आंध्र, तमिलनाडु और केरल के वीरशैवों से संबंधि त है ऐसा मानना पड़ेगा, नहीं तो फिर 'वीरशैव' पद को जबरदस्ती लादकर लिंगायत धर्म और समाज को विघटित करने का यह षड़यंत्र पंचपीठाधीशों का है ऐसा मानना चाहिए। लिंगायत समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इस तरह से पृथक करना संभव है क्या? अगर पंचपीठाधीशों को वीरशैव ब्राह्मण माना जाए तो वे अन्य लिंगायत वीरशैव क्षत्रिय (?) और वीरशैव वैश्यों (?) के घरों में निमंत्रण (भोजन का) स्वीकार करके जातिभ्रष्ट नहीं हुए हैं क्या? अगर हिन्दू समाज की वर्णाश्रम व्यवस्था के कीचड़ में फँसे पिछड़ी जातिवाले उससे बचने के लिए लिंगायत बनने के बाद भी उसी कीचड़ में फिर से उन्हें फँसना पड़े तो दीक्षा लेने का मतलब ही क्या? ऐसी एक किताब प्रकाशित होने पर बालेहल्ली मठवालों ने लिंगायतों का वर्गीकरण करना शुरू किया तो हमने प्रतिरोध किया ऐसा भद्रावती के लिंशरण मुरगेप्पाजी ने कहा हुआ मुझे अभी भी याद है । ऐसे कुत्सित विचारों की पुस्तक प्रकाशित होकर बाहर आयी तब भद्रावती से पूरी एक बस के लोग बालेहोन्नूर गये और उन्हें पूछा "स्वामीजी, ब्राह्मण वैश्य और शूद्रों के घर में भोजन करता है क्या' स्वामीजी ने कहा, "नहीं।" "अगर करेगा तो क्या होगा?" इस पर उन्होंने कहा, "वह जातिभ्रष्ट होगा । उसका शुद्धिकरण करना पड़ेगा ।"

लोगों ने कहा, "आपने लिंगायतों को चतुर्वर्ण में वर्गीकरण करके हमें शूद्र बना दिया है। हमारे घरों में आपने कई बार भोज निमंत्रण स्वीकार करके भोजन किया है। इससे आप जाति भ्रष्ट हो गये हैं! अब आपका शुद्धिकरण करना अनिवार्य हो गया है।" यह बात सुनकर स्वामीजी सन् होकर रह गये! आप ही दी हुई रस्सी से अपने हाथ बँध जायेंगे इसकी कल्पना शायद उन्हें नहीं आयी होगी !!

पूज्यनाच्छिवभक्तस्य पुण्या गतिर्वाप्यते ।
अवमानान्महाघोरो नरकोनात्र संशयः ।। 26 ।।
शिवभक्तोमहातेजाः शिवभक्तिपराड.मुखान् ।
न स्वृशेन्नैव वीक्षेत न तैः सहवसेत् कवचित् ।।27 ।।
यदा दीक्षा प्रवेशः स्याल्लिंगधारण पूर्वकम् ।
तदाप्रभृति भक्तो सौपूजयेत स्वागतस्थितान् ।। 28 ।।
स्वमार्गाचार निरताः सजातीया द्विजास्तुये ।
तेषाम्गृहेषु भुंजेत नेतरेषाम् कदाचन ।। 29 ।।
स्वमार्गा मुखैर्भविभिः प्राकृतात्मभिः
प्रेषितम् सकलम् द्रव्यमात्मलीनमपि त्यजेत् ।। 30 ।।

शिवभक्ति से विमुख लोगों को छूना महातेजस्वी शिवभक्त के लिए मना है उनका जरा-सा भी सहवास नहीं करना चाहिए।।27 || लिंगधारण करके जिस दिन दीक्षा होती है, उस दिन से प्रतिदिन भक्त को वीरशैवागम के अनुसार आचरण करनेवाले पूज्य गुरू स्थल के माहेश्वर की पूजा करनी चाहिए। ।।28।। अपनी-अपनी जाति धर्म के अनुसार आचारनिष्ठ वीरशैव द्विज याने वीरशैव ब्राह्मण-वीरशैव क्षत्रिय और वीरशैव वैश्य अपनी-अपनी जाति के लोगों के घरों में ही भोजन कर सकते हैं । ब्राह्मणों को क्षत्रिय और वैश्यों के यहाँ भोजन नहीं करना चाहिए। शिवोक्ताम् जातिमर्यादाम् येतीत्यभुविवर्तते । स चंडाल इत्ति ज्ञेयः सर्वकर्म बहिष्कृततः ।। शिव के द्वारा बतायी गई जाति मर्यादा का जो भंग करता है उसे चांडाल मानकर सर्वकर्म बहिष्कृत किया जायेगा; ऐसा शिवागमों में घोषित किया गया है। इसलिए वीरशैव मत वालों को अपनी-अपनी जाति धर्म के अनुसार बर्ताव करना चाहिए, न कि उसके विरूद्ध में बर्ताव करके नरक के भागी बने । ||29 || वीरशैवाचार से विमुख बने प्राकृत भवियों द्वारा भेजे गये सकल पदार्थ अपने कब्जे में हो तो भी उनको छूना नहीं चाहिए । ।।30 ।।

जनगणना का विवरण

सन् 1901 की जनगणना Census of India, Vol IX -B Bombay Part III इसमें प्रादेशिक वर्गीकरण जानकारी है। R. E. Enthoven इसके संपादक हैं। मुंबई प्रांत की जानकारी में 'लिंगायत' के अंतर्गत इन उपजातियों का उल्लेख किया गया है। (पृ. सं. 222)

1. रजक
2. गुरू (जंगम)
3. बढ़ई
4. रंगरेज़
5. बनिया
6. देवांग
7. तेली
8. माली
9. लोहार
10. कृषक
11. कुम्हार
12. नाई
13. ग्वाला
14. राजगीर (थवई)
15. गड़रिया
16. चुडिहारा
17. कलाल
18. पंचाचारवाले
19. सुनार
20. वणिक

इस तरह की करीब 43 जातियाँ सन् 1901 की जनगणना के वक्त, मुंबई प्रांत में 'लिंगायत' के अंतर्गत दाखिल की गई है। मुंबई प्रांत में बेलगाँव, बिजापूर, धारवाड, केनरा, कोलाबा, रत्नागिरी आदि का समावेश था। इसमें ध्यान, देने लायक अंश ये है कि पूरे चार्ट में कहीं भी 'वीरशैव' पद को 'लिगायत' के समान अर्थ में तो छोड़ो, एक उपजाति के रूप में भी दाखिल नहीं किया गया। इसका अर्थ मुबई प्रात में इस पद का प्रवेश भी नहीं हुआ था।

Extract of Census of India-1891
Volume xxv - Mysore
Part II Imperial Census India - index of castes. V. N. Narasiman Iyengar Provin- cial Superintendent of Census operation in Mysore. Printed at the Goverment Central printing press - 1893, Book No: 315-487- IN D 1891 Vol. 2 Caste No. 56 page No. 309.

मैसूर प्रांत के लिंगायत समाज में प्रचलित उपजातियाँ:-

1. लिंगायत-आराध्य
2. लिंगायत-अय्य (गुरू, जंगम)
3. लिंगायत- बनिया
4. लिंगायत-रंगरेज़
5. लिंगायत-पटेल
6. लिंगायत-ग्वाला
7. लिंगायत-लिंगायत
8. लिंगायत-पट्स्थल
9. लिंगायत- सज्जन
10. लिंगायत- शीलवंत
11. लिंगायत- तमिल जंगम
12. लिंगायत- वीरशैव

इस तरह की करीब 38 उपजातियाँ सन् 1891 में की गई जनगणना के वक्त दाखिल की गई हैं। लिंगायत समाज की इन 38 उपजातियों में 'वीरशैव' केवल एक उपजाति है। केरल की सन् 1881 की जनगणना में S. No. 445 से 449 तक पृ. सं. 347 पर केवल 'लिंगायत' यह नाम ही दाखिल हुआ है | Imperial Census of India 1881-Operation and results in the presidency of Madras (Book No. 315-482 IND 1881, Volume-4)

आंध्र और तमिलनाडु के एक कोने में 'वीरशैव' नामक एक छोटा पंथ नगण्य रूप से अस्तित्व में था । वह वर्णाश्रम पर आधारित है यह देखकर हानगल कुमार स्वामीजी और काशीनाथ शास्त्रीजी के नेतृत्व में रंभापुरी मठवालों ने षड्यंत्र रचकर 'वीरशैव' पद को लिंगायत धर्म पर लादके उसे परेशान कर दिया है। सन् 1901 में पूरे भारत की जनगणना के वक्त लिंगायतों की संख्या 25, 37, 745 (पच्चीस लाख सैंतीस हजार सात सौ पैंतालीस) पृ. सं. 570, वे अंदमान, बंबई, कोडगु, मद्रास, हैदराबाद, मैसूर और त्रावणकोर इन प्रांतों में रहते हैं । 'लिंगायत' के अंतर्गत आनेवली उपजातियाँ इस प्रकार हैं: बनिया, धोबी, ग्वाला, नायडू, शीलवंत, सुनार, सुतार, तेली, कृषक, माली, लिंगायत आदि। तेलगु भाषी प्रान्त में 4371 वीरशैव और 1553 वीरशैव लिंगायत जन हैं ऐसा दर्ज किया गया है। यह बड़ी महत्वपूर्ण जानकारी है। इसके अनुसार आंध्र में सन् 1901 की जनगणना के वक्त 4371 वीरशैव थे तो लिंगायत धर्म का स्वीकार किए हुए वीरशैव 1553 जन थे। इस पर से ये पता चलता है कि लिंगायत धर्म का स्वीकार करनेवाले 40-50 जातियोंवालों में से वीरशैव एक ऐसा ही पंथ है। 'लिंगायत' इस शीर्षक के अंतर्गत बाकी जातियों की सूचि बनायी गई है। सन् 1911 की जनगणना में लिंगायत लोगों की संख्या 29, 76, 293 (उनतीस लाख छिहत्तर हजार दो सौ तिरानबे) थी। 10 साल की कालावधि ा में 4,38,548 ( चार लाख अड़तीस हजार पाँच सौ अड़तालीस) इतने लिंगायतों की संख्या वृद्धि हुई। सन् 1901 और सन् 1911 की जनगणना लिंगायतों की संख्या स्पष्ट रूप से पता चलती है। प्रांत के अनुसार की गई जनगणना में भी लिंगायतों की संख्या स्पष्ट रूप से पता चलती है। प्रांत के अनुसार ये संख्या इस प्रकार दी गई है:-

प्रांत धर्म कुल पुरुष स्त्री
मुंबई लिंगायत 13,49,248 6,83,472 6,65,776
कोडगु लिंगायत 7558 3697 3861
मद्रास लिंगायत 1,34,592 66376 68217
हैदराबाद लिंगायत 7,57,611 3,81,201 3,64,340
मैसूर लिंगायत 7,29,431 3,65,091 3,64,340

इन सभी वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि सभी प्रांतों में 'लिंगायत' यही पद प्रमुख है, साथ में उपजातियाँ भी दी गई हैं। हैदराबाद प्रांत को छोड़कर अन्यत्र किसी भी राज्य में 'वीरशैव' का उल्लेख नहीं । तमिलनाडु (मद्रास प्रांत) और केरल (कोचीन और त्रावणकोर) इनमें भी 'वीरशैव' का उल्लेखन नहीं। तमिलनाडु में लिंगधारी लिंगायतों को 'जंगम' कहके पुकारा जाता है। 'जंगम' इस शीर्षक के अंतर्गत उनकी संख्या बताई गई है ।

इसके बारे में और ज्यादा विवरण दे सकते हैं। सन् 1881 से 1901 तक चले इंपीरिअर सेन्सस के अंतर्गत तमिल देश की जातियों के अनुसार की गई जनगणना में क्र. सं. 3029-3096 के तहत लिंगायत की 64 उपजातियाँ गिनाई गई है। इनमें क्र. सं. 3073 और 3094 में केवल दो जातियों को 'लिगायत वीरशैव' कहा गया है। उसी तरह तेलगु देश की जातियों में क्र. सं. 4040-4056 तक की जातियों में क्र. सं. 4056 और 4061 की जातियाँ 'लिंगायत-जंगम' बताई गई हैं। कुल 27 तेलगु लिंगायत जातियों में केवल दो जातियों को 'लिंगायत-जंगम' बताया गया है । उसी तरह कन्नड देश की लिंगायत जातियों में 38 जातियाँ गिनाकर उनमें 38 वीं जाति 'वीरशैव' बताई गई है। इसका मतलव तमिल की 64 जातियाँ, तेलगु की 27 जातियों में से केवल तीन जातियों को 'लिंगायत-वीरशैव' और दो जातियों को 'लिंगायत-जंगम' बताया गया है । याने 134 जातियों को लिंगायत की उपजातियाँ बताकर उनमें से सिर्फ तीन जातियों को 'लिंगायत-वीरशैव' और दो को 'लिंगायत-जंगम' कहा गया है । इसका अर्थ ये हुआ कि मुख्य धर्म लिंगायत कहकर उसके अंतर्गत वीरशैवों और जंगमों को एक जाति के रूप में बताया गया है न कि वीरशैव में लिंगायत का समावेश किया गया है। अगर लिंगायत को एक बड़ा सर्वे नंबर माना जाये तो उसमें वीरशैव और जंगम ये दोनों हिस्सा नंबर होंगे। लेकिन ज्यादातर लोग मानते हैं वैसे वीरशैव में लिंगायत नहीं है। 'लिंगायत' इस (134 जातियाँ) 134 एकड़ के खेत में 'वीरशैव' केवल तीन हिस्सा नंबर में सीमित है, 'जंगम' भी 2 हिस्सा नंबर के लिए सीमित है। और भी स्पष्ट करना हो तो इस तरह बता सकते हैं कि 'लिंगायत' नामक पिता के 134 बेट हैं और उनमें 3 जन वीरशैव तथा 2 जन जंगम हैं। बाकी के 129 बेटे अलग-अलग हैं ऐसा कह सकते हैं | Mythic Society की किताब क्र. 315-487 के IND 1891-V2 और P-309, 315-487 IND-190/- V2 PEA; तथा 315-482-IND- 1881 -V4 में इसके साक्ष्य हैं। इसे छोड़कर वीरशैव और लिंगायत ये दोनों समान पद हैं ऐसा दावा करनेवाले कृपया ये समझ लें, लिंगायत धर्म रूपी पिता की 134 संतानों में वीरशैव तथा जंगम ये दोनों भी संतानें हैं। मतलब लिंगायत रूपी पिता की ये दोनों संतानें हैं। पिता से संतानों का जनन होता है न कि संतानों से पिता का । इसलिए प्राज्ञ जनों को ये समझ लेना चाहिए कि एक बृहत् समाज में समाये हुए एक पंथ का नाम पूरे धर्म को देना अन्याय है, अनादर है ।

मूलपाठ:
1) लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म - A book written by Her Holiness Maha Jagadguru Mata Mahadevi, Published by: Vishwakalyana Mission 2035, II Block, chord Road, Rajajinagar, Bangalore-560010.

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