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लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म

✍ पूज्य श्री महाजगद्गुरु डा॥ माते महादेवि


लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म

सन् 1969 के दिसम्बर माह में कर्नाटक के उडुपी में विश्व हिन्दू परिषद ने विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया था। तब मैंने 'हिन्दू यारू?' अर्थात् 'कौन है हिन्दू ?' नामक एक छोटीसी किताब लिखी, जो लोगों को बहुत ही पसंद आयी और हाथों-हाथ बिक भी गई। उसके बाद बहुत से तथ्यों के साथ सन् 1983 में फिर एक बार विस्तृत रूप से इसे प्रकाशित किया गया। सन् 1997 तक दस बार इसका प्रकाशन किया गया। इसके बाद बहुत मांग होने पर भी इस किताब का पुनः प्रकाशन नहीं किया गया। इसकी प्रमुख वजह थी हमारी विचारधारा में आया हुआ परिवर्तन ।

परमपूज्य श्रीमान् निरंजन महाजगदगुरू लिंगानंद स्वामीजी और मैं 'हिन्दू' पद के लिए अत्यन्त विस्तारित अर्थ बताते थे। “हिन्दू यह कोई एक विशिष्ट धर्म, नहीं, जाति, मत, पंथ नहीं, बल्कि अनेक स्वतंत्र धर्मों के मिश्रण से बना मिश्र धर्म मानों अनेक वैविध्यपूर्ण फलों के पेड़ों का एक बाग हो ।

- पूज्यश्री लिंगानंद स्वामी जी

ऊँ कारपर श्रद्धा रखकर मंत्ररूप में उसकी उपासना करने वाले जो हैं वे हिन्दू हैं।

- माताजी (पूज्य श्री महाजगद्गुरु डा॥ माते महादेवि)

हमारा यह प्रतिपादन देखकर हर्षित बने माननीय श्री हो. वे. शेषाद्रि जी ने दि. 6.11.1985 को एक प्रशंसात्मक खत भी लिखा, जो इस प्रकार था-

समंजसपूर्ण प्रतिपादन

पूज्यश्री माता महादेवी जी को साष्टांग प्रणाम । मासिक पत्रिका 'कल्याण किरण' के विशेष अंक पर से नजर फेरने का सुयोग प्राप्त हुआ । 'मातृहरके' नामक लेख में और 'लिंगायत 'धर्म सार' नामक किताब में आपने दिया हुआ हिन्दुत्व का विवरण, पढ़कर मैं अत्यन्त आनन्दित हुआ ।

आज कई बाहरी और अंदरूनी स्वार्थी शक्तियाँ हमारे समाज में अनेक प्रकार के अंतःकलह पैदा करने के प्रयत्न कर रही हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में आपने किया हुआ प्रतिपादन सचमुच समयोचित है, इतना ही नहीं, बल्कि समंजस भी है। केवल लिंगायत धर्मी ही नहीं, बल्कि वैदिक धर्मी, बौद्ध धर्मी, जैन धर्मी, सिक्ख धर्मी इस तरह सभी लोग इससे उजाला पा सकते हैं। समाज की संघटना के लिए अपनी अल्प शक्तियों को खर्च करने वाले हमारे जैसे कार्यकर्ताओं को इस विवरण से दस भुजाओं का बल प्राप्त हुआ है।

आपको हम सब आत्मीय सहकार्यकर्ताओं का कृतज्ञतापूर्वक प्रणाम । प्रभु सेवा में आप ही का

दिनांक: 6.11.1985

- हो. वे. शेषाद्रि, उत्थान, बेंगलूर


लेकिन सन् 1997 के बाद हमारी विचारधारा में पूरा बदलाव आ गया । हिन्दू एक धर्म नहीं बल्कि अनेक धर्मों के सम्मिलन से बना मिश्र ध र्म है ऐसा मानने के बाद, जैन-बौद्ध, लिंगायत-सिक्ख धर्म उसमें है ऐसा कहने पर 'हिन्दू' एक धर्म है ऐसा नहीं कह सकते। और अगर 'हिन्दु' एक धर्म है ऐसा हम मानेंगे तो इसमें रहने वाले जेन, बौद्ध लिंगायत, सिक्ख ये केवल जाति, मत या पंथ बनकर रह जायेंगे। लेकिन वास्तव में इन सारे धर्मों का अपना- एक स्वतन्त्र अस्तित्व और आचार-विचार संहिता है। दुनिया के सभी ग्रंथों में 'हिन्दू' को एक धर्म की हैसियत से ही शामिल किया गया है। भारत की जनगणना में 'हिन्दू' को एक धर्म ही माना गया हे। इस हाल में 'हिन्दू यानी कई धर्मों के मिश्रण से बना मिश्र धर्म' यह व्याख्या केवल किताबों और भाषणों के लिए ही सीमित बनकर रह जायेगी पर वास्तविक रूप में नहीं ।

संस्कृति के मायने में देखा जाये तो वेषभूषा, नाम, पारिवारिक परंपरा आदि में लिंगायत धर्मी हिन्दू संस्कृति के निकट हैं पर धार्मिक रूप से वे हिन्दू नहीं हैं। खुद विश्व हिन्दू परिषद ने 'हिन्दू' पद की जो व्याख्या की है वह देखिये-

'भारत में उदित हुए सनातन नैतिक और आध्यात्मिक जीवन सिद्धान्तों में आदर और श्रद्धा रखने वाले तथा उनका निष्ठा से पालन करने वाले (वे चाहे किसी भी देश, प्रांत, कुल, जाति या संप्रदाय के हों) और अपने आपको हिन्दू कहलवाने वाले सभी हिन्दू हैं।'

कितनी शिथिल और असमर्पक व्याख्या है ये! न कोई दीक्षा देकर धर्म प्रवेश कराना, न वैदिक धर्म का प्रमुख चिन्ह जनोई यज्ञोपवित के द्वारा दूसरों को देना, चाहे कोई भी हो उसे खुद ही श्रद्धा बढ़ाकर उसका पालन कर अपने आप को हिन्दू कहलवाये तो बस हुआ! हिन्दु धर्म का कोई एक संस्थापक गुरू नहीं, समाज को नियंत्रण में रखने वाला कोई एक शास्त्र नहीं, यही इस अव्यवस्था का कारण है। दुनिया के प्रथम योगी, ऊँ कार के द्रष्टा, भारतीय धार्मिक परंपरा के मूल पुरूष 'योगीराज शिव' ने दिया हुआ शैव धर्म अपने मूल स्वरूप में व्यवस्थित रूप से चला आ रहा होता तो सचमुच भारत देश एक अद्भुत धर्म परंपरा का वारिस होता । दुर्भाग्य से शिवजी ने दिये हुए शैव धर्म ने आर्यों के आगमन के बाद वैदिक प्रभाव में आकर उनकी वर्णाश्रम व्यवस्था और पुरोहितशाही को अपना लिया । अपना मूल स्वरूप खोकर उसने विकृत रूप धारण किया। इस तरह से वैदिक व्यवस्था द्वारा जो अव्यवस्था निर्माण हुई उसे सुधारने के लिए कई नये धर्मों को जैसे-जैन, बौद्ध, लिंगायत-सिक्ख को उदित होना पड़ा। भारतीय धार्मिक इतिहास का अध्ययन और यहाँ उदित धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर हमें यह ज्ञान हुआ कि लिंगायत धर्म भी जैन-बौद्ध और सिक्ख धर्मों की भांति एक स्वतंत्र धर्म है । इस अध्ययन और जानकारी के सहारे हमने ये निर्णय लिया कि लिंगायत हिन्दू धर्म का अंग नहीं हें इस जानकारी की फलश्रुति ही प्रस्तुत साहित्य कृति है । इसके परिणाम कई तरह से हो सकते हैं। जैसे-

1) हिन्दुवादी संघटनायें जैसे- विश्व हिन्दू परिषद, आर.एस.एस. आदियों को लिंगायत समाजक हिन्दू समाज की कक्षा से बाहर जाना खेदजनक लगेगा। इससे हिन्दू समाज की शक्ति दुर्बल होगी ये डर उन्हें सता सकता है।

2) हिन्दू राष्ट्र की उन्नति को ही अपना ध्येय मानने वाले संघ परिवार और दूसरे हिन्दुवादियों को यह डर भी सता सकता है कि कहीं भारत की समग्रता को इससे धक्का न पहुँचे ।

ये दोनों अर्थहीन डर है। क्योंकि धार्मिक रूप से सैद्धान्तिक रूप से लिंगायत हिन्दू न हों फिर भी सांस्कृतिक रूप से देसी नाम, वेशभूषा आदि से वे हिन्दू विरोधी तो निश्चित ही नहीं । देशहित की दृष्टि से जैन, लिंगायत और सिक्ख कभी भी भारत के विरोधी नहीं बन सकते, क्योंकि लिंगायतों के लिए भारत धर्मभूमि है। जिन धर्मों के संस्थापक भारत में पैदा हुए हैं उन धर्मों के अनुयायी कहीं भी हो उन्हें भारत ही धर्मभूमि है। कोई भी हो वे जिस देश में जन्म लेते है, पलते है वह देश उनकी मातृभूमि होती है तो उनके धर्म संस्थापको की जन्मभूमि धर्मभूमि होगी । "लिंगायत धर्म एक स्वतंत्र धर्म है, अहिन्दू धर्म है।" इस जागृति से होनेवाले सत् परिणाम ऐसे हैं ।

1. प्रगतिशील विचारधारा और वैचारिकता से भरा 'लिंगायत' नाम का एक धर्म विश्वगुरू बसवेश्वर जी ने दिया इसके अस्तित्व का भारत को ही नही बल्कि पूरी दुनिया को पता चलने का अवसर इससे प्राप्त होगा ।

2. जागतिक धर्मों की श्रृंखला में लिंगायत धर्म का नाम समाविष्ट होगा ।

3. आज कई लिंगायत धर्मी अपने धर्मगुरु की इच्छा और धर्म के संविधान के विरुद्ध आचरण जैसे- होम-हवन, नवग्रह पूजा, प्राणी बलि अन्य देवतार्चन, पेड़-वृक्षों की पूजा आदि कर रहे हैं। उनको धर्म का उपदेश जिन्हें करना चाहिए वे गुरुजन और मंडलेश्वर ही ये सब कर रहे हैं इसलिए लिंगायत धर्म का सार एक देवोपासना को वे छुपा रहे हैं, उसे उपदेश करने का नैतिक हक उन्होंने गँवाया है। लोग अज्ञानता के कारण ऐसा आचरण कर रहे है। शरणों का (संतो का) वचन साहित्य लोग जैसे-जैसे पढ़ते जाऐंगें वैसे-वैसे मंडलेश्वरों का गलत आचरण वे शीघ्र ही जान लेंगें । लिंगायत धर्म का असली स्वरूप जान लेने के बाद उनका भय दूर होगा और आत्मबल भी बढ़ेगा।

4. गुरु बसवेष्वरजी और उनके समकालीनों के वचन पढ़ने पर एक सुंदर शरण समाज की जो कल्पना उभरती है वह आज रूपित हुए लिंगायत समाज को देखने पर पानी के बुलबुले की तरह भंग हो जाती है । वचन साहित्य के प्रशंसक पूछते हैं कि बसव तत्व बहुत ही अच्छा है, पर ये लोग क्यों ऐसे है ? इस विपर्यास का कारण है, समाज का वचन साहित्य के संसर्ग में न होना। इस तरह से लिंगायत धर्मी खुद जो गलत आचरण करते हैं उसी में समाधान और संतृप्ति का अनुभव करते हैं। अपना धर्म स्वतंत्र और अवैदिक धर्म है इसका ज्ञान उन्हें होता है तब तात्विक शुद्धिकरण शीघ्रता से साध्य होता है, अपने धर्म के आचरण से अलग और धर्मगुरू की इच्छा के विरूद्ध आचरणों को छोड़ने का वे प्रयत्न करते हैं। वे अपनी गलतीयाँ सुधारें या न सुधारें लेकिन कम से कम हम जो कर रहे हैं वह गलत है इतना तो वे समझे बगैर नहीं रहेंगे।

इस नजरिये से यह पुस्तक बहुत उपयोगी साबित होगी ऐसा मैं मानती हूँ।

मूलपाठ:
1) लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म - A book written by Her Holiness Maha Jagadguru Mata Mahadevi, Published by: Vishwakalyana Mission 2035, II Block, chord Road, Rajajinagar, Bangalore-560010.

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