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लिंगायत और वीरशैव अलग-अलग हैं।

✍ पूज्य श्री महाजगद्गुरु डा॥ माते महादेवि


लिंगायत और वीरशैव अलग-अलग हैं।

कुछ लोग दुराशय से और कुछ लोग अज्ञान से वीरशैव-लिंगायत इन दोनों शब्दों को समान अर्थ में और एक ही धर्म के दो नाम कहकर इस्तेमाल करते हैं। यह पूरी तरह से गलत, असंबद्ध और असत्य है । उदाहरण के लिए:-महम्मदीय धर्म और इस्लाम कहकर कोई इस्तेमाल करता है तो ये दोनों शब्द कुरान का बोधन करनेवाले धर्म के लिए ही अन्वय होते हैं। वैसे ही लिंगायत और वीरशैव एक ही धर्म के लिए अन्वम होनेवाले शब्द नहीं हैं। उनमें क्या फर्क है यह अब हम देखेंगे।

वीरशैव लिंगायत धर्म
1. शिवजी पर वीरतम भक्ति रखनेवाले वीरशैव कहलाते हैं। 1. सृष्टिकर्ता लिंगदेव पर भक्ति रखनेवाले लिंगायत कहलाते हैं।
2. सामाजिक रूप से चतुर्वर्ण व्यवस्था को माननेवाले । 2. वर्ण जाती पद्धति आदि को न माननेवाले ।
3. दलित और अस्पृश्यों को दीक्षा निषिद्ध है। 3. सभी मानवों को दीक्षा लभ्य है ।
4. स्थावर लिंग की पूजा करनेवाले । 4. केवल इष्टलिंग की पूजा करनेवाले ।
5. बहुदेवता उपासक 5. एकदेवोपासक
6. धर्मगुरू बसवेश्वरजी को धर्मगुरू न माननेवाले । 6. लिंगायत धर्म के संस्थापक गुरू बसवेश्वरजी हैं ऐसा दृढ़ता से माननेवाले। ।
7. वेद, आगम, शिव पुराण इन्हीं को आधार ग्रंथ माननेवाले । 7. वेद, आगम, पुराण इनको न मानते हुए केवल वचन साहित्य को ही धार्मिक संविधान माननेवाले ।
8. संस्कृत धर्मभाषा है। जिस प्रांत में रहते हैं वही की भाषा बोलते हैं। 8. धर्मभाषा कन्नड है । कहीं भी रहें कन्नड को ही अपने घर की बोलचाल की भाषा बनाये रखते हैं ।
9. यहाँ शिवाद्वैत सिद्धान्त है । 9. यहाँ शून्य सिद्धान्त है,
10. इनमें भक्त - माहेश्वर ये भेद हैं । 10. शरण समूह में ऐसा कोई भेद नहीं। जंगम अथवा माहेश्वर जन्म द्वारा निश्चित होनेवाली जातियाँ नहीं है ।
11. वीरशैवों द्वारा पूजित लिंग स्थावर लिंग के नन्हे-से रूप होते हैं और चतुर्वर्ण के अनुसार शिला, सुवर्ण, रजत, पारद आदि धातुओं से बनते हैं। उनपर विशेष कवच नहीं होता। ये शिवलिंग शिव का प्रतीक होता हैं, 11. लिंगायतों द्वारा पूजित इष्टलिंग गोलाकार और कांतियुक्त आवरणवाले होते हैं। सभी लिंगायत एक ही प्रकार के क्रांतियुक्त कवचवाले लिंगों को धारण करके उनकी पूजा करते हैं। इष्टलिंग पार्वतीपति शिवजी का प्रतीक नहीं है, यह पूरे ब्रह्मांड के स्वामी लिंगदेव का प्रतीक है।
12. तमिलनाडु के वीरशैवों के लिए तिरुवाचकम्, आंध्र के वीरशैवों के लिए श्रीकर भाष्य आदि धर्मग्रंथ माने जाते हैं। 12. लिंगायतों के लिए वचन साहित्य ही धर्मग्रंथ माना जाता है ।
13. दीक्षा के बाद पहले की जाति या वर्ण नहीं मिटते । (तमिलनाडू के वीरशैव) 13. दीक्षा के बाद पहले की जाति या वर्ण के भेद मिट जाते हैं। सभी समान हो जाते हैं।
14. दीक्षा प्राप्त ब्राह्मण वीरशैव, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वीरशैवों में आपस में रोटी-बेटी के संबंध नहीं होते । 14. दीक्षा प्राप्त लिंगायतों में आपस में रोटी-बेटी के संबंध होते हैं।
15.वीरशैवों के अनेक पंथों में मांसाहार है (केरल वीरशैव)। केरल के 7 पंथों में 3 पंथ शाकाहारी और 4 पंथ मांसाहारी हैं, 15. लिंगायत धर्मी शुद्ध शाकाहारी हैं।
16. शवों का दहन किया जाता है, 16. शवों की समाधि क्रिया की जाती है ।
17. पंचसूतकों को मानते हैं 17. पंचसूतकों को नहीं मानते ।

लिंगायत समाज में सिर्फ 'लिंगायत' यही पद प्रचलित था। गुरु बसवेश्वरजी इसके संस्थापक हैं यही मान्यता दृढ़ थी। गुरु बसवेश्वरजी को उनके स्थान से नीचे उतारने के लिए, लिंगायत समाज में लिंगी ब्राह्मण, लिंगी शूद्र इस तरह बँटवारा करके ऊँच-नीचता का निर्माण करने के धूर्त विचार से शीतलीकृत शवागार में पडे 'वीरशैव' पद को कृतकता से समाज में, साहित्य में घुसेड़कर अखिल भारत वीरशैव महासभा के स्थापक हानगल कुमार स्वामीजी और पंचपीठवालों ने लिंगायत धर्म का इतिहास, समाज और साहित्य विकृत कर दिया ।

वीरशैव वैदिक संप्रदाय का ही अनुसरण करता है। ब्राह्मण वटुओं को उपनयन संस्कार दिया जाता है वैसे हीं जंगम वटुओं को अत्याचार (बाल जंगमत्व ) का संस्कार दिया जाता है । ब्राह्मणों में लड़कियों को उपनयन नहीं किया जाता वैसे ही जंगमों की लड़कियों को अ, याचार (बाल जंगमत्व) नहीं किया जाता । ब्राह्मण वटुओं की शिखा (चोटी) रखी जाती है उसी तरह जंगमों के बच्चों की भी शिखा रखी जाती है । लिंगायत धर्म में भक्त-महेश्वर (जंगम) ऐसा भेद किये बिना सब को इष्टलिंग दीक्षा दी जाती है। हृदय के अंतर्गत रहने वाले आत्म चैतन्य के प्रतीक इष्टलिंग को सीने पर धारण करने का सत संप्रदाय लिंगायतों में है। उस सत् संप्रदाय को हटाकर वीरशैव वादियो ने जनेऊ की तरह लंबा पवित्र धागा आडा बाँध कर उसके सिरे से इष्टलिंग रखा हुआ करंडक बाँधने की रीत जारी की गई, जनेऊ न होने के कारण ये शूद्र है' वैदिकों के इस आरोप से मुक्त होने के लिए, 'हम लिंगी ब्राह्मण हैं।' ऐसा कहलाने के लिए 'वीरशैव' पद को आगंतुक रुप से लिंगायत समाज में घुसेड़ा गया। तमिलनाडु, आंध्र वीरशैवों में चतुर्वर्ण वर्गीकरण होने के कारण इस पद की बाहर से लाकर घुसेड़ने के साथ-साथ पंचपीठाधीशों ने लिंगायत समाज में भी चतुर्वर्णों को घुसेडने का साहस किया ।

उन्होंने अपनी धर्म संहिता वचन साहित्य का अध्ययन और पारायण करना छोड़कर संस्कृत पाठशाला खोलकर वैदिकता के पाठ पढ़ाकर पूजा, दीक्षा और पौरोहित्यों का वैदिकीकरण किया। बारहवीं सदी से उन्नीसवीं सदी तक न बिगड़नेवाली लिंगायत शरण संस्कृति बीसवीं सदी में विकृत होने लगी। उत्तर भारत में ब्राह्मण वर्णवाले शर्मा, शास्त्री ऐसे नाम रख लेते हैं वैसे ही कर्नाटक में भी अपने नाम के आगे वेदमूर्ति और आखिर में शर्मा, शास्त्री, आराध्य ऐसे नाम रख लेने लगे। लिंगायतों में गोत्र, सूत्र, शाखा आदि बताने की परिपाटी ही नहीं थी । इन्हें पूछकर पंचपीठ के मठवालों ने लिंगायतों को भ्रम में डाल दिया ।

मूलपाठ:
1) लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म - A book written by Her Holiness Maha Jagadguru Mata Mahadevi, Published by: Vishwakalyana Mission 2035, II Block, chord Road, Rajajinagar, Bangalore-560010.

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