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लिंगायत धर्म गुरु बसवण्ण

बसवण्ण आदि गुरु कैसे ?

(१) लिंगायत धर्म के प्राण रूप इष्ट लिंग चिन्ह को प्रस्तुत करनेवाले विश्वगुरु बसवण्णा है।
(२) वचन साहित्य रूपी धार्मिक संविधान (Constitution) को देनेवाले विश्वगुरू बसवण्णा है।
(३) साम्प्रदायिक योगों से भिन्न दृष्टियोग प्राधान्य शिवयोग को देनेवाले बसवण्णा है।
(४) उनका ही माम 'श्री गुरुबसव लिंगाय नम:' मंत्र बना है। यही उनके, लिंगायत धर्म के आदि गुरु मानने की ज्वलंत साक्षी है। इन सब बातों को स्पष्ट करनेवाले कई शारणों के वचनों को देखें-
(अ) शिव समय पतिप्रापनाचार्य बसवण्णा
(आ) आयत में पूर्वाचारी को देखा।
(इ) लिंग जंगम प्रसाद के माहात्म्य के लिए बसवण्णा ही आदि है।
(ई) आदि में हुम गुरु होने के कारण तुम से हि लिंग उत्प्न्न हुआ
.... हसीं कारण से
... तुम्ही पूर्वाचारि हो
.... संगन बसवण्ण। -आल्लम प्रभुदेव.
(उ) जरादाराध्य बसवण्णा है, प्रथम गुरु बसवण्णा है।
(ऊ) अनिमिषय्या को लिंग प्रदान करनेवाले बसवण्णा है।
... बसवण्णा के सांप्रदायिक शिशु तुम हो।
... बसवण्णा के सांप्रदायिक शिशु मैं हुँ। -चन्नबसवण्णा
(ऋ) कपिल सिद्ध मल्लिनाथ ने बसवण्णा को दिखाया तो मैं जीवित रह ग्या। - सिद्ध रामेश्वर
(ए) ’जग-हितार्थ के लिए बसवण्णा पृथ्वी पर अवतरित हुए। -अक्कमहादेवी
(ऐ) बसवा-बसवा कहते लिंग को जल न चढानेवाले की भक्ति शून्य जानो कलिदेवरदेवा। - मडिवाळ माचिदेव

उपर्युक्त सभी कथन बसवण्णा के समकालीन शरणों के वचन हैं। बाद के शरण संप्रदाय के कुछ कवियों के कथन इस प्रकार हैँ-

प्रथमाचार्य - पाल्कुरिके सोमनाथ
वीरशैव निर्णय परमावतार - मग्गेय मायिदेव
राय पूर्वाचार्य - चामरस
षटूस्थल निर्णायक - गुब्बि मल्लणार्य
वर वीरशैव को स्थिर किया - मरितोंटदार्य

कथन स्पष्ट करते हैँ कि बसवण्णा लिंगायत धर्म के केन्द्र बिन्दु तथा आधारशक्ति है। जिस प्रकार बीच के एक केन्द्र स्तंभ के आधार पर पूरा तंबू खडा रहता है वैसे ही बसवण्णा रूपी केन्द्र-स्तंभ पर लिंगायत धर्म संपूर्ण रूप से स्थिर है। उनका स्थान उन्हीं के लिए सुरक्षित है, अन्य किसी को नहीं दिया जा सकता।

बसव भानु की तत्व प्रभा में चमक उठे प्रभुदेव, अक्कमहादेवि, सिद्धरामेश्वर, मरुळ सिद्धेश्वर, रेवणसिद्ध आदि कई आदि शरण। एक सौ एक विरक्त, जंगम सम्राट सिद्धलिंगेश्वर, षण्मुख स्वामि, सर्वज्ञ आदि मधकालिन शरण हैं। आज कल के बाललीला महंत शिवयोगि, आथणी शिवयोगि आदि नूतन शरण हैं। ये सभि लिंगायत धर्म के गुरु हैं किन्तु धर्म गुरु नहीं। इसिलिए केवल बसवण्णा ही धर्मगुरु है। प्रथमाचारि हैं। इसे अचल रुप से माननेवाला ही लिंगायत है। इसी को जनपद कवियों ने कितने सुन्दर ढंग से वर्णन किया है -

प्रकाश भरकर छलक उठा, संसार को आश्रय दिया ।
कल्याण के नगाडों ने घोषित किया
कि इस नये धर्म का स्तंभ बसवा है ।

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