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हिन्दू धर्म यानी क्या?

✍ पूज्य श्री महाजगद्गुरु डा॥ माते महादेवि


हिन्दू धर्म यानी क्या?


लिंगायत धर्म के स्वरूप को समझ लेने से पहले, लिंगायत धर्मी हिन्दू नहीं है यह जानने के लिए हिन्दू धर्म के स्वरूप को समझ लेना जरूरी है। हिन्दू धर्म को समझाने के लिए हजारों पृष्टों का ब्यौरा देना जरूरी है, क्योंकि कुछ ही वाक्यों में इसे व्याख्यापन करना साध्य नहीं ।

'हिन्दू' यह शब्द पुरातन पर्शियन लोगों द्वारा सिन्धु नदी को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था । संस्कृत भाषा के सभी 'स' कारक शब्द पुरातन पर्शिया भाषा में 'ह' कारक बन जाते हैं, इसीलिए 'सिन्धु' 'हिन्दू' बन गया" -स्वामी विवेकानन्द

सिन्धु नदी के तट पर बसे हुए लोगों को 'हिन्दू' कहकर पुकारने की परिपाटी पर्शिया, ग्रीस, अरेबिया आदि के लोगों द्वारा चली आई है। इस तरह 'हिन्दू' यह शब्द प्रारंभ में भौगोलिक रूप से शुरू हुआ था, धर्मसूचक नहीं। पर्शियन लोगों को 'स' कारक शब्द 'ह' कारक रूप से उच्चारित करने की आदत थी, इसीलिए 'सिन्धु' शब्द 'हिन्दू' बन गया । पहले सिन्धु नदी के तट पर बसनेवाले लोगों के लिए ही 'हिन्दू' शब्द का उपयोग किया जाता था, लेकिन बाद में धीरे- धीरे इसे पूरे भरत - खण्ड के निवासियों के लिए कहा जाने लगा । वचन साहित्य में देखा जाये तो वहाँ शैव, वैदिक, वैष्णव, शाक्त, कालामुख, कापालिक आदि शब्दों का प्रयोग किया हुआ दिखाई देता है लेकिन 'हिन्दू' पद का प्रयोग कहीं भी नहीं किया गया । भरत खंड के बाहर से आनेवाले लोगों ने यहाँ के मूल निवासियों को 'हिन्दू' पद प्रयोग से पुकारा । वास्तव में 'हिन्दू' कोई धर्म नहीं है, मुस्लिम जन यहाँ के मूल निवासियों को 'हिन्दू' कहते हुए इस देश को 'हिन्दुस्तान' कहने लगे। तब हिन्दुस्तान में रहने वाले सभी जैन, बौद्ध उन्हें हिन्दू ही लगे, उनके अनुसार हिन्दू याने जो मुस्लिम नहीं वे ही हिन्दू हैं ।

फिर ब्रिटिशों का शासन प्रारंभ हुआ तो उन्होंने अध्ययन करके जैन, बौद्ध और सिक्खों का आचरण सांप्रदायिक हिन्दू धर्म से अलग है यह देखकर उन्हें अहिन्दू धर्म माना । सांप्रदायिक हिन्दू लोग अपने धर्म को वैदिक धर्म, सनातन धर्म कहते थे। भारत में रहने वाले मूल निवासी आदिवासी जन और द्रविड जन, बाद में आये हुए आर्य लोग-इस तरह सब की आस्थायें - आचार-विचार इनकी मिलावट से बना धर्म 'हिन्दू धर्म' कहलाया । इसीलिये इसमें 'इद मित्थम्' कहकर यही सही है ऐसा दृढ़ता से कह न पाने का वातावरण निर्माण हुआ है।

हिन्दु धर्म का कोई एक संस्थापक नहीं है, इसलिए आर्यों का भारत में प्रवेश होने से पहले जो शिव संस्कृति थी, उसके मूल पुरूष योगीराज शिव को एक तरह से स्थापक कह सकते हैं। क्योंकि ऊँ कार के द्रष्टा शिव हैं। जैसे हिमालय में जन्मी गंगा अपने साथ कई झरने और नदियों को साथ मिलाकर बढ़ती हुई बृहत् नदी बनीं वैसे ही शिव से स्थापित शैव धर्म बाद में आई हुई आर्य धर्म-संस्कृति को अपने में समोकर, समय के बहाव के साथ पर्शियन आदियों द्वारा हिन्दू धर्म' कहलाया । अनेक ऋषि-मुनि जन, साधु-संत जन, तत्वज्ञ - दार्शनिक और पुजारी -पुरोहित इन सबने लिखे हुए बोल-परस्पर विरोधाभास से भरे हुए होने पर भी ये सारे हिन्दू धर्म में शामिल हुये हैं ।

वेदों में ही परस्पर विरूद्ध विचार हैं । परमात्मा एक ही है यह विचार इनमें है और इसके साथ-साथ मित्र, अग्नि, वरुण, पूषण आदि देवताओं की स्तुति है। निरिश्वरवाद भी है और सेश्वरवाद भी है। ज्ञानकांड भी है तो कर्मकांड भी है । यज्ञ-यागादि का आचरण है तो इसका खंडन भी इनमें है। ब्रह्म सूत्र, उपनिषदों पर भाष्य लिखा गया है। इन्हीं श्लोकों पर अद्वैत, द्वैत, विशिश्टाद्वैत के अनुसार टीका लिखी गई है। दया, अहिंसा आदि नीतियों को बोधा गया है, । क्षुद्र देवताओं को प्राणी बलि देने के बारे में भी कहा गया है। योग-ध्यान आदि अत्यन्त सुसंस्कृत क्रियायें हैं, तो स्वेच्छाचार से भरे तांत्रिक मार्ग भी है। परस्पर राग-द्वेष से युद्ध करने वाले देवताओं के चरित्रों को पुण्य कथा मानकर सुनने की परिपाटी के साथ ब्रह्मचर्य पातित्रत्य, एकपत्नी व्रत आदि आदर्शों का वैभवीकरण भी है। इस तरह हिन्दू धर्म अत्यन्त संकीर्ण (मिश्रित) व्यवस्था से बना धर्म है ।

इस पृष्टभूमि पर देखा जाये तो सामान्यतः एकरूप सिद्धान्त, आस्था, आचार-विचार, विधि-विधानों से बने जैन, बौद्ध, लिंगायत-सिक्ख धर्म हिन्दू धर्म से अलग ही दिखाई देते हैं। श्री बालगंगाधर तिलकजी कहते हैं, "Acceptance of the vedas with reverence, recognition of the fact that the means or ways to salvation are diverse; and the realization of the truth that the number of gods to be worshipped is large; that indeed is the dis- tinguishing feature of Hinduism." वेदों को भक्ति और आदर से मानना, मुक्ति साधना के मार्ग बहुतेरे हैं इस सत्य को जानना और उपासना के देवताओं की संख्या भी बड़ी है इस सत्य का अनुभव करना सचमुच यही हिंदुत्व का वैशिष्ठयपूर्ण लक्षण है ।"

वेदों को धर्मग्रंथ मानकर चलना, मोक्ष साधना के लिए कई मार्ग है यह मानना, पूजा के योग्य असंख्य देवता हैं इस पर विश्वास रखना- ये सारे हिन्दु धर्म के विशेष लक्षण हैं।

गोमाता का रक्षण हिन्दु धर्म का मुख्य कर्तव्य है । इसके बारे में महात्मा गांधीजी ऐसा कहते हैं, "Cow Protection is dearest Pos- session of the Hindu sect. No one who does not believe in cow protection can possibly be a Hindu. It is a noble belief. Cow worship means to me worship of innocence."

"गोरक्षण हिन्दू पंथ की सबसे प्यारी दौलत है। गोरक्षण में जो विश्वास नहीं रखता वह हिन्दू नहीं हो सकता, यह एक उदात्त आस्था है। मुझे लगता है, गोपूजा याने मुग्धत्व की पूजा ।"

शुद्ध शाकाहारी लिंगायत धर्म केवल गोमाता ही नहीं बल्कि घोड़ा, भेड़-बकरी, हाथी, मुर्गी आदि सभी प्राणियों को जीने का हक देने की बात करता है। प्राणी पूजा का लिंगायत धर्म में निषेध किया गया है, इसलिए यहाँ गोपूजा नहीं की जाती। हिन्दुओं के लिए गोमाता, गंगा, गायत्रीमाता, गीता ये पूजनीय हैं। लेकिन लिंगायत धर्म में ये हैं क्या: ? यह हिन्दु धर्म से अलग है या उसका अविभाज्य अंग है इसके बारे में देखेंगेः-

हिन्दू धर्म लिंगायत धर्म
1. एक संस्थापक गुरु नहीं है। 1. बारहवीं सदी के गुरु बसवेश्वरजी लिंगायत धर्म के संस्थापक हैं ।
2. हिन्दु धर्म में नास्तिक, निरिश्वरवादी, सेश्वरवादी है। 2. यह सेश्वर वादी धर्म है और इसमें सृष्टिकर्ता पर विश्वास रखना अत्यावश्यक है ।
3. वेद, आगम को प्रमाण माना जाता है । 3. वेद, आगम और पुराणों को प्रमाण नहीं माना जाता । वचन साहित्य को आधार माना जाता है।
4. चतुर्वर्णों पर विश्वास करता है, 4. जाति और वर्ण के आधार पर विभजन को नहीं मानता ।
5. द्विजवर्णियों को ही उपनयन का अधिकार है । 5. सभी मानवों को इष्टलिंग दीक्षा का अधिकार है।
6. स्त्रियों को उपनयन नहीं है । 6. पुरूषों की तरह स्त्रियों को भी लिंगदीक्षा है ।
7. कई देवताओं पर श्रद्धा रखी जाती है और बहुदेवतोपासना की जाती है। 7. सृष्टिकर्ता कूडलसंगम देव पर ही श्रद्धा रखी जाती है और एकदेवोपासना की जाती है।
8. तीर्थक्षेत्र यात्रा पर श्रद्धा होती है। 8. तीर्थक्षेत्र यात्रा पर श्रद्धा नहीं होती ।
9. ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और मुहूर्तो पर विश्वास रखा जाता है । 9. इन सब में विश्वास नहीं रखा जाता ।
10. हिन्दु धर्म के श्रद्धा केन्द्र मंदिर हैं । 10. लिंगायत धर्म के श्रद्धा केन्द्र अनुभव (वसव) मंटप है ।
11. शाकाहारी और मांसाहारी दोनों होते हैं । 11. शाकाहार अत्यावश्यक माना गया है।
12. होम-हवन, यज्ञ-याग, प्राणी बलि आदि सभी हैं । 12. इन सब का निषेध किया गया है ।
13. विवाह में अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लगाये जाते हैं और पुरोहित जी का होना जरूरी है। 13. अग्नि साक्षी और सात फेरे नहीं होते। केवल गुरु-लिंग-जंगम को साक्षी माना जाता है ।
14. द्विजों के शवों का अग्नि दाह संस्कार किया जाता है । 14. लिंगायतों के शवों को जमीन में गाड़ा जाता है ।
15. पुरोहितों द्वारा पूजा की जाती है । 15. भक्त द्वारा देव की सीधी पूजा की जाती है ।
16. हिन्दु धर्मियों में आंतरजातीय विवाह नहीं होते। 16. लिंगायत धर्मियों में आंतरजातीय विवाह सहज रूप से होते हैं ।
17. जो हिन्दु नहीं उन्हें दीक्षा देकर हिन्दु धर्म में शामिल नहीं किया जा सकता। 17. दीक्षा देकर किसी को भी लिंगायत धर्म में शामिल किया जा सकता है।
18. जन्म, मरण, उच्छिष्ट, जाति, रजो सूतक का पालन किया जाता है। 18. पंच सूतकों का निषेध किया गया है।
19. पाप के लिए प्रायाश्चित है । 19. पाप के लिए प्रायश्चित नहीं सिर्फ पश्चाताप है ।
20. ब्रत, नियम, उपवास आदि है। 20. धार्मिक आचरणों के रूप में नहीं है ।
21. उद्योग में ऊँच-नीच है । 21. सभी उद्योग और उद्योगियों को समान माना जाता है।

मूलपाठ:
1) लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म - A book written by Her Holiness Maha Jagadguru Mata Mahadevi, Published by: Vishwakalyana Mission 2035, II Block, chord Road, Rajajinagar, Bangalore-560010.

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