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लिंगायत धर्म साहित्य "वचन साहित्य"

आद्धशरणों के वचन पारस है रे भाई!
यह सदाशिव नामक लिंग है, उस पर विश्वास करो रे,
विश्वास करते ही तुम विजयी हो भाई!
होंठ को कड़वे, पेट को मीटे,
कूडलसंगम के शरणों के वचन
नीम के स्वाद की तरह है भाई! /39 [1]

आद्य शरणों के वचन
दूध की नदिया में गूड के कीचढ
और शक्कर की रेत, मिसरी की हैं फेनिल लहरों की तरह है।
ऐसे वचन को छोड़कर, हे! कूडलसंगमदेव
मेरी मति ऐसी हूई
जैसे कूँवा खोदकर पिया हो खारा पानी। /404 [1]

पाताल का पानी रस्सी के बिना निकाल सकते हैं क्या
सोपान के होते हूए भी
शब्द सोपान बनाकर चलाया पुरातन शरणों ने
यह देवलोक के लिए मार्ग है जानिए,
मर्त्यलोकवासीयों के मन के मैल को मिटाने
वचनवाणी रूपी ज्योति को प्रकाशित कर दिया
कूडलचेन्नसंग के शरणों ने। /833[1]

हमारे एक वचन-पारायण के आगे
व्यास का एक पुराण भी बराबर नहीं
हमारे एक सों आठ वचनों के आध्ययन के सामने
शतरुद्रीय याग बराबर नहीं
हमारे वचनों के हजार पारायण के आगे
गायत्रि का लाख जप समा नहिं सकता।
के कपिलसिद्धमल्लिकार्जुन। / 969[1]

इस वचन के अनुभाव का अर्थ
सारे वेदागम-शास्त्र-पुराणों में है देखो।
इस वचन के अनुभाव में जो अर्थ नहीं है
सारे वेदागम-शास्त्र-पुराणों मे भी नहीं है, देखो।
इस वचन के अनुभाव का अर्थ
सारे वेदागम-शास्त्र-पुराणों की पहूँच के भी बाहर है, देखो।
इस वचन के अनुभाव का अर्थ
सकल वेदागम-शास्त्र-पुराणातीत है देखो,
अप्रमाण कूडलसंगम देव। /2441[1]

[1] Number indicates at the end of each Vachana is from the book "Vachana", ISBN:978-93-81457-03-0, Edited in Kannada by Dr. M. M. Kalaburgi, Hindi translation: Dr. T.G. Prabhashankar 'Premi'. Pub: Basava Samiti Bangalore-2012.

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