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लिंगायत धर्मस्थापक, धर्मगुरु बसवण्ण

कल्याण रूपी दीय में
भक्तिरस रूपी तेल भरकर
अचार रूपी बाती में
बसवण्णा रूपी ज्योति का स्पर्श करते ही
चमक-दमक कर जगमगा रहा था
शिव का प्रकाश।
उस प्रकाश में विराज थे वे असंख्य महागण!
क्या यह बात झूठ है कि जहाँ हो शिवभक्त
वह अविमुक्त क्षेत्र है?
क्या यह बात झूठ है कि जहाँ हों शिवभक्त
वह देश पावन है?
गुहेश्वर लिंग में अपने परमराध्य
संगनबसवण्णा को पाकर मैं धन्य हुआ, सिद्धरामय्या। /496 [1]

’कुंडलिंग’ नामक कीट के जैसे
बदन को मिट्टी से अनछुवा रखा तुमने
बसवण्णा।
जल में कमल के जैसे
जल मे रहकर भी जल से अनछुआ
रहा न तुम बसवण्णा
जल से बने मोती जैसे
जल स्वयं न बनकर
तुम अलग ही रहे न बसवण्णा।
गुहेश्वर लिंग का आदेश लेकर
तनगुण से उन्मत्त
ऐश्वर्य से अंधे के धर्म को
क्या करने आये हो
हे संगन बसवण्णा? /509 [1]

सती सहित व्रती बना बसवण्णा
व्रती होकर ब्रह्मचारी बना बसवण्णा
ब्रह्मचारि होकर भवरहित हूवा बसवण्णा
गुहेश्वर, आपमें बाल ब्रह्मचारि हुवा केवल बसवण्णा ही। / 618[1]

बसवण्णा मर्त्यलोक में आये। अपना घर ’महामने’ बनाकर
उसमें भक्ति-ज्ञान रूपी ज्योति को प्रकाशित करने पर
सुज्ञान रूपी प्रभा का प्रसार हुवा जग में।
प्रकास में प्रज्ञापूर्वक देखकर, सारे शिवगण आ मिले।
कूडलचेन्नसंगमदेव,
आपके शरण बसवण्णा की कृपा से, सभी शिवगण
प्रभुदेव के निज स्वरूप को देखकर निश्चिंत हुए। /840[1]

मांसपिंड न लगे मंत्रपिंड लगे बसवण्णा,
वायुप्राणि न लगे लिंगप्राणि लगे बसवण्णा
जगभरित शब्द न मानकर शरणभरित लिंग लगे
कूडलचेन्नसंगय्या में बसवण्णा। /872[1]

स्वर्ग के लिए आया नहीं, स्त्री के लिए आया नहिं
भोजन के लिए आया नहीं, वसन के लिए जाया नहीं
कूडलचेन्नसंगय्या।
भक्ति पथ दिखाने आया बसवण्णा। /939[1]

तन से दासोह कर गुरुप्रसादि बना बसवण्णा।
मन से दासोह कर लिंगप्राणि बना बसवण्णा।
धन से दासोह कर जंगमप्राणि बना बसवण्णा।
इस प्रकार त्रिविध से दासोह कर,
सद्गुरु कपिलसिद्धमल्लिकार्जुन
आपका शरण स्वयं प्रसादि बना बसवण्णा। /1015[1]

कामारी शिव को जीता मैंने आपकी कृपा से बसवा,
सोमधर शिव को पाया मैंने आपकी कृपा से बसवा,
नाम से स्त्री होने से क्या हुवा
भाव से पुरुष रूप हूँ बसव आपकी कृपा से
अतिकामी चेन्नमल्लिकार्जुन को फंसाकर
द्वैतभाव मिटाकर हुई उसमें एकमेव बसव, आपकी कृपा से। /1161 [1]

मुँह में जो स्वाद है
उसे थूककर फिर निगल पाएंगे क्या?
आँखों में बसे रूपी से
विलग होकर क्या उसे फीर देख पाएंगे?
हाथ में जो वस्तु है उसे छोडकर
दुबारा उसे पकढ पाएंगे?
अपने में बसे घनमहिम को छोड़कर
क्या दूसरा ढूँढ़ पायेंगे?
रेकण्णप्रिय नागिनाथ
बसवण्णा से तर गया यह सारा लोक। /1841[1]

बसव का नाम कामधेनु है देखो
बसव का नाम कल्पवृक्ष है देखो
बसव का नाम पारसमणि है देखो
बसव का नाम संजीवनी मूलिका है देखो
ऐसे बसवनाममृत
मेरी जीभ में भरकर बाहर भी छलकते, मन भरा था।
वह मन भरकर छलकते सकल इंद्रियों में भरा था
उन सकल करणेंद्रियों में भरकर छलकते
सर्वांग के रोमरंध्रो को छेदन करने के कारण
बसवाक्षर रूपी जहाज में चढ़कर
बसव बसव बसवा बोलते
भव सागर को पार किया मैंने, अखंडेश्वरा। /2480[1]

[1] Number indicates at the end of each Vachana is from the book "Vachana", ISBN:978-93-81457-03-0, Edited in Kannada by Dr. M. M. Kalaburgi, Hindi translation: Dr. T.G. Prabhashankar 'Premi'. Pub: Basava Samiti Bangalore-2012.

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