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लिंगायत:शरण का अंगन ही कैलास (देवलोक) है

देवलोक - मर्त्यलोक क्या भिन्न कहीं है?
इसलोक में फिर अनंतलोक?
शिवलोक है शिवाचार
शिवभक्त का वासस्थान ही देवलोक है,
शिवभक्त का अंगन ही वाराणासि है
शिवभक्त का काया ही कैलास है
यही सत्य है हे कूडलसंगमदेव। /232 [1]

शरण निद्रा में है तो उसे जप समझो,
शरण जागे बैठता है तो उसे शिवरात्री समझो,
शरण पैर रखे तो पवित्र है देखो,
शरण की वाणी ही शिवतत्व है देखो,
कूडलसंगय्या के शरण की काया ही
कैलास है देखो जी। /363 [1]

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भटक-भटक कर आने से क्या हुआ?
लाख गंगा में नाहाने से क्या हुआ?
मेरु गिरि की चोटी पर होकर खढे पुकारने से क्या हुआ?
व्रत-नियमों से नित तन को दंडित करने से क्या हुआ?
जो मन करता नित सुमिरन, ध्यान
छलांग इत उत लगाते मन को
चित्त में केंद्रित कर सके तो
गुहेश्वर लिंग केवल शून्य का प्रकाश है। /625 [1]

अंग पर लिंग संबंध होने पर
क्षेत्र तीर्थ क्यों जाना!
अंग पर धारित लिंग को स्थावर लिंग के लगने पर
किसको महान् कहूं? किसको लघु कहुँ?
जो महत्, वाक् से परे हैं
उसे न समझकर बरबाद हुए।
जंगमदर्शन होने पर सिर नवाते पावन होते
इष्टलिंगदर्शन होने पर हस्तस्पर्श से पावन होते
पास जो इष्टलिंग है उसे झुठ मानकर
दूर स्थित लिंग को नमस्कार करनेवाले
व्रतभ्रष्ट को मत दिखाओ!
कूडलचेन्नसंगय्या। /653 [1]

दूध हाथ में लेकर मख्कन ढूँडते हैं क्या?
लिंग हात में रखकर पुण्यतीर्थ जाते हैं क्या?
लिंग संगी के लिए अन्य देव भजन क्यों?
’इष्टलिंगमविधस्य योन्यदैवमुपासते।
धानयोनिसतं गत्वा चाड्णालर्गहमाचरेत्॥’
इसप्रकार कहा गया है,
ऐसे पातकियों के लिए अघोरनरक मिलेगा ही,
कूडलचेन्नसंगमदेव। /934 [1]

भक्तों के लिये गरीबी कैसी?
सत्यवानों के लिये कर्म कैसा?
मन:पूर्वक सेवा करने वाले भक्त को
मर्त्य क्या, कैलास क्या?
वह जहाँ रहता है वहीं पुण्यक्षेत्र है
उसका अंग ही अमरेश्वलिंग का संग-सुख है। /1526 [1]

वारणासि, अविमुक्त क्षेत्र यहीं पर है,
हिमवत्‌ केदार, विरूपाक्ष यहीं पर है,
गोकर्ण, सेतु रामेश्वर यहीं पर है,
श्रीशैल का मल्लिकार्जुन यहीं पर है,
सकल लोक पुण्यक्षेत्र यहीं पर है,
सकल लिंग उळियुमेश्वरा अपने में है। /1595

सच्चे शिवैक्य को सुप्रभात अमवास्या है
कड़ी दुपहर ही संक्रांति है
फि अस्तमान होती है पूनम
भक्त के घर का आँगन ही है वारणासि रामनाथ। /1714 [1]

देनेवाला मनुष्य है कहो तो,
मारो उसके मुँह पर, पादरक्षा से,
मनुष्य के हृदय में, ईश्वर स्वयं प्रवेश कर,
जितना चाहिये दिलायोग, देवराय सोड्डळ! /2115 [1]

[1] Number indicates at the end of each Vachana is from the book "Vachana", ISBN:978-93-81457-03-0, Edited in Kannada by Dr. M. M. Kalaburgi, Hindi translation: Dr. T.G. Prabhashankar 'Premi'. Pub: Basava Samiti Bangalore-2012.

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