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तन नंगा रहने से या भटक-भटक कर आने से देव खुश नहीं, मन को शुद्ध करों

तन नंगा रहने से क्या हुआ
जबकि मन ही शुद्ध न हो?
सिर मूँड़ाने से क्या हुआ
जबकि भाव ही लय न हो?
भस्म लगाने से क्या हुआ
जबकि इंद्रिय गुणों को जलाएँगे नहीं?
इस प्रकार आशा व वेष के ढोंग पर
गुहेश्वर तेरी कसम, दुत्कारुँगा। /530 [1]

नहाकर की पूजा ईश्वर की
कहनेवाले संदेही मानव, सुनो तो,
क्या नहाएगी नहीं मछली?
क्या नहाएगा नहीं मगरमच्छ?
स्वयं नहाकर, जब तक नहाओगे नहीं अपने मन को तो
इस चमत्कार की बात को मानेगा क्या
हमारा गुहेश्वर? /593 [1]

भटक-भटक कर आने से क्या हुआ?
लाख गंगा में नहाने से क्या हुआ?
मेरु गिरि की चोटी पर होकर खड़े पुकारने से क्या हुआ?
व्रत-नियमों से नित तन को दंडित करने से क्या हुआ?
जो मन करता नित सुमिरन, ध्यान
छलांग इत उत लगाते मन को
चित्त में केंद्रित कर सके तो
गुहेश्वर लिंग केवल शून्य का प्रकाश है। /625 [1]

[1] Number indicates at the end of each Vachana is from the book "Vachana", ISBN:978-93-81457-03-0, Edited in Kannada by Dr. M. M. Kalaburgi, Hindi translation: Dr. T.G. Prabhashankar 'Premi'. Pub: Basava Samiti Bangalore-2012.

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