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20. भंडार के दुरपयोग का आरोप

भंडार (धनागार) के दुरपयोग का आरोप

जिस प्रकार मधुमक्कियाँ सब ओर से उड़ती पुष्पवाटिका में आती हैं उसी प्रकार अंग, वंग, कलिंग, गुर्जर, ब्रह्मदेश, काश्मीर, सिंहल से मुमुक्षु कल्याण में आये ; श्रीबसवेश्वर के दिव्य भव्य व्यक्तित्व की शरण में आये और उनके तत्वों से आकर्षित होकर कल्याण में ही रह गये। बसवधर्म की स्वीकृति के पश्चात् अनुभव मंडप के धर्म प्रचारक बनकर वे देश तथा नगर के विविध भागों में संचार करके धर्म प्रचार के मार्गदर्शन करने से अछूत, शूद्र, दीन-दलित सभी अनुभव -मंडप में आकर अपने जीवन को सुधारने लगे।

हरिहर के मतानुसार बसव के अनुयायी "पेट भर भोजन करते; तन भर कपड़े ओडते हैं। ये इनके वैयक्तिक हो तो दासोह, समाज सेवा आदि आर्थिक कायक्रमों में भी भाग लेते हैं । प्रतिदिन अनुभव मंडप का संदर्शन करते हैं। ज्ञान गोष्ठियों में भाग लेते हैं ।" ऐसे सुधारित संतृप्त जन जीवन बिताने की रीति को देखकर कोण्डी मंचण्णा तथा अन्य अनेक राजकीय सहोद्योगियों में जलन हुई। श्रीबसवेश्वरजी के ऊपर किसी तरह का अपराध लादकर अधिकार से निकालने की तरकीब करने लगे ।

उन्होंने राजा बिज्जल से शिकायत की कि दिन भर परिश्रम करने पर भी गरीबी नहीं हटती है। फिर बसवेश्वरजी को धन कहाँ से आता है ? ऐसे सुख-संपत्ति का जीवन बिताने का रहस्य है आप ही का खजाना। बिज्जलने संशयग्रस्त होकर पूछताछ करने बसवेश्वर को बुला भेजा। राजा चुगलखोरों की बातों पर कितने शीघ्र विश्वास कर बैठे इस विचार मात्र से व्यथित होकर बसवेश्वरने आय-व्यय का हिसाब, खजाने का धन राजा को सौप दिया।

राजा बिज्जल ने परीक्षा की तो खजाना सहीसलामत और भरपूर था। इसके पहले के सभी वित्त सचिवों के प्रशासन काल से भी अधिक आय की प्राप्ति को देखकर राजा संतुष्ठ हुए। आय-व्यय का हिसाब समर्पक रहा। राजाने बसवेश्वर से पूछा कि बुजुर्ग, मुनीमों के समय में साध्य न होनेवाली समृद्धि को तुमने साध्य किया है। इस कीर्ति का क्या रहस्य है ?

"बिज्जल महाराज-" कायक ही कैलास नामक मंत्र में है इस कीर्ति का रहस्य । पृथ्वी वैभवशाली है, अति उदार है। जितना परिश्रम करे उतना फल देती है। भगवान ने खाने के लिए सिर्फ मुँह ही नहीं दिया है। खाने के लिए मुँह दिया है तो परिश्रम करने के लिए दो हाथ भी दिये हैं। यदि मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक उपार्जन करे तो समृद्धि स्वाभाविक ही है। आलसी से कई तरह के कष्ट पैदा होते हैं। मेरे अनुयायी कोई भी रहे वे सब नियम से कायक करते हैं। मेरा सिद्धांत है कि " व्रत की भूल सहन कर सकते है न कि काय की भूल का" इसलिए कायक (कर्म) श्रद्धा ही हमारे देश की प्रगति का महामंत्र है। दूसरा है कि कायक (परिश्रम) से जो धन मिलता है उसमें से अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए कनिष्ठ प्रमाण में रखकर बाकी को दासोह के द्वारा दूसरों को देते हैं । अब लोगों में खजाने को इमान्दारी से मालगुजारी देने की प्रज्ञा उत्पन्न हुई है । शरण केवल शुद्ध, सात्विक जीवन ही नहीं बिताते बल्कि लोगों में शिक्षा के माध्यम से इस तरह का भाव भी पैदा करते हैं। इस कारण देशने सर्वांगीण रूप से अद्भुत प्रगति और विशेष कीर्ति की है।

"ओह, बसवेश्वर मैं कैसा विचित्र व्यक्ति हूँ । मैंने चुगलखोरों की बातों में आकर आप जैसे महापुरुषों पर संदेह किया ; इसके लिए क्षमा चाहता हूँ।”

"उसे वहीं पर रहने दीजिए महाराज ! "

गाँव के सामने जब दूध की नदी बह रही है
तो बाँझ गाय के पीछे क्यों भागूँ?
निर्लज्ज होने की क्या बात? बेशर्मी की क्या बात?
जबतक कूडलसंगमदेव साथ हैं
बिज्जळ का राजभण्डार मुझे क्यों चाहिए?
/ 76 [1]

मैं इस सिद्धांत का पालन करता हूँ। मेरे भक्त भी ऐसे ही हैं। उन्होंने भी अत्यंत इमान्दारी के प्रति सौगन्ध खायी है । वे किसी तरह धन संचय करके, कहीं तीर्थ क्षेत्रों में घूमकर, नदी-तालाबों में डुबकियाँ लगाकर पाप हरण चाहनेवाले नहीं हैं। इन्हें विश्वास है कि शुद्ध प्रामाणिक व्यवहार ही पूजा है, कायक ही कैलास है। यदि समृद्धि, संतृप्ति उनमें हैं तो उनके स्वयं के कायक (उद्योग) पर भी है

"बसवेश्वर" मैं सच्चे हृदय से क्षमा मांगता हूँ । इसके अतिरिक्त एक निवेदन आप के सामने प्रस्तुत करता हूँ । आप के ससुर को स्वर्गस्थ हुए पर्याप्त समय बीत गया है । उस स्थान की नियुक्ति के लिए योग्य व्यक्ति के न मिलने के कारण उसे रिक्त ही रख छोड़ा है। अब मुझे ज्ञात हो गया है कि अधिकार के लिए तरसनेवालों से उत्तम काम नहीं होगा। केवल सेवामनोभाव, राष्ट्रप्रज्ञा, प्रजाप्रेम की दृष्टि से अधिकार पर जो आसीन होते हैं उन्हीं से महोन्नत कार्य संभव होगा

'वह सब सही है, महाराज, मैं किसी मनुष्य को खुश करने का कार्य नहीं करूँगा। देश के हित की दृष्ठि से परिश्रम करता हूँ। जब मेरा ऐसा उदात्त आदर्श है, आप यदि अन्य लोगों की चापलूसी की बातों को सुनकर मुझ पर संदेह करें तो मेरे मन को ठेस लगेगी। मैने सेवा करने का साधन मानकर उस अधिकार को स्वीकार किया न कि अधिकारसे चिपके रहने के लिए।”

महाराज, सार्वजनिक परिशुद्ध सेवा का व्रत धारण करनेवाला मैं भगवान की सौगन्ध खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ -

सुबह उठकर आँखें मलते हुए
मैं अपने पेट के लिए, अपने आभूषणों के लिए,
मैं अपने पत्नी-बच्चों के लिए चिंतित होता हूँ तो
मेरे मन के लिए, मेरा मन ही साक्षी है,
‘आसने शयने याने संपर्क सहभोजने।
संचरंति महाघोरे नरके कालमक्षयम् ।।’
नाम की श्रुति बसवण्णा पढ़ता है, ऐसा कहते हैं।
भवि बिज्जळ के सिंहासन के नीचे बैठकर
सेवा करता हूँ- ऐसा कहते हैं प्रमथगण,
क्या उनको उत्तर दे सकता हूँ? नहीं नहीं,
अस्पृश्यों के घर में जाकर भी
अच्छी मजूरी करके भी क्यों न हो,
आपके विचारों के आचरण के लिए चिंतित होता हूँ,
अपने पेट के लिए यदि चिंतित होता हूँ।
तो सिर मेरा ले लीजिए
हे! कुडलसंगमदेव।
/ 421 [1]

प्रभु, सार्वजनिक सेवा व्रतधारी का जीवन शुभ्र धवल वस्त्र के समान होता है। बहुत ही सावधानी से उसकी रक्षा करनी है। उसी तरह मैं प्रमाणिकता, तत्वनिष्ठा से अपने जीवन की रक्षा करता हूँ । स्वर्ण में से एक रेखा, अन्न में से एक दाना, वस्त्र में से एक धागा, कल के लिए, परसों के लिए छिपा रखूँ तो, तुम्हारी सौगन्ध, शरणों की सौगन्ध ।

इतना ही नहीं। अपने तन, मन, धन को सौंपकर आप की सेवा करूँगा । इसका कारण है कि आप को श्रेष्ठ व्यक्ति मानकर नहीं बल्कि देश का राज करनेवाली प्रभुशक्ति मानकर सेवा रत हूँ । राष्ट्र के कार्य में जो भी आवश्यक हो मैं दृढ मन से उसके लिए परिश्रम करूँगा

चोरी के लिए यदि निकले आप
मैं सुराख के लिए छेनी लूँगा आप बंदित हों
आप तो पहले मैं बंदित होऊँगा आप
आप की कसम आप के प्रमथों की कसम
शासक के सदाचार व्यवहार को ही न कहूँ अपना
कट जाय मेरा सिर घन कूडलसंगमदेव ॥

"हमारे देश के प्रयोजनार्थ कोई भी कार्य आप करें और यहाँ तक कि देश के निमित्त चोरी भी करें मैं आप से भी पहले सुराख लगाने छेनी लेकर आगे बढूँगा। प्रजा हित के लिए आप बन्धित हो जायें तो आप से भी पहले मैं बन्धित हो जाऊँगा । त्याग करने में तिल भर भी पीछे नहीं हदूंगा। राष्ट्र के प्रशासन करनेवाली प्रभु शक्ति का गौर हत्पूर्वक करूँगा ।

बसवेश्वर की यह तत्वनिष्ठा, राष्ट्रप्रेम की इन बातों को सुनकर बिज्जल आनंदित हुआ। उन्हें मंत्री का मुकुट पहनाया। अधिकार का प्रतीक तलवार सौंपकर बसवेश्वर को प्रेम से आलिंगन करके राजाने आनंद बाष्प की वृष्टि की।

अपने ऊपर बिज्जल की इस ममता को देखकर बसवेश्वर मूक हुए। बिजली के समान उन पर जो आरोप लगा था वह फूल की तरह बदलकर उनकी कीर्ति-प्रगति का सहायक बना। इस दैवलीला को देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। जो विष बनकर आया था वह अमृत बन गया । आग्रह अभिमान में बदल गया। आरोप अभिनंदित हो गया। यह कैसा अद्भुत दैवानुग्रह कहकर बसव के मुख से वचन "निकल पड़ा-

आप प्रसन्न हो तो ठूँठ में निकलेगा अंकुर
आप प्रसन्न हो तो बाँझ गाय बन जायेगी दुधारूँ।
आप प्रसन्न हो तो विष सब अमृत बन जायेगा
आप प्रसन्न हो तो सब कुछ
सम्मुख प्राप्त हो जायेंगे कूडलसंगमदेव।
/ 256 [1]

बिज्जल का अत्यधिक अभिमान श्रीबसवेश्वर के ऊपर व्यक्त होन से चुगलखोरों के मुख पीले पड़ गये। उन्होंने साँप फेंका था पर वह बसवेश्वर के गले में फूलमाला हो गया। वे सब दिग्भ्रांत हुए। बिज्जल बोले ...

"बसवेश्वरजी आप को मैं न्याय दंड देने का अधिकार देता हूँ। आप पर मिथ्यारोप करनेवालों को आप जिस तरह चाहे दंड दे सकते हैं ।"

"महाराज ! मेरे जीवन की आकांक्षा है कि दुष्टों का परिवर्तन करना न कि उनका निर्मूलन ! मैं अपेक्षा करता हूँ कि उनका हृदय परिवर्तित हो जाये। मैं आशा करता हूँ वे मुझ को भी समझ पायेंगे "

"आप का औदार्य, क्षमागुण अपार है। आप ज्ञान की संपत्ति ही नहीं बल्कि क्षमागुण की संपत्ति भी है।"

इस प्रकार श्री गुरु बसवेश्वर ने राजसत्ता में उन्नत आसन पर आरूढ हुए।

सन्दर्भ: विश्वगुरु बसवन्ना: भगवान बसवेष्वर के जीवन कथा. लेखिका: डा. पुज्या महा जगद्गुरु माता महादेवी। हिंदी अनुवाद: सी. सदाशिवैया, प्रकाशक: विश्वकल्याण मिशन बेंगलुरु,कर्नाटक. 1980.

[1] Number indicates at the end of each Vachana is from the book "Vachana", ISBN:978-93-81457-03-0, Edited in Kannada by Dr. M. M. Kalaburgi, Hindi translation: Dr. T.G. Prabhashankar 'Premi'. Pub: Basava Samiti Bangalore-2012.

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