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9. बलदेवरस का आगमन

कूडलसंगम क्षेत्र का मेला

कूडलसंगम क्षेत्र का मेला होने के समय के नजदीक आने के साथ ही गुरुकुल विद्यार्थी वृन्द का घटिकोत्सव समारंभ भी समीप आया। चालुक्य राज्य के मन्डलेश्वर बिज्जलराजा के प्रधान आमात्य बलदेवरस कई दिनों से कुलदेवता के दर्शन नहीं किये थे। इतने में अतिथि के रूप में भाग लेने के लिए गुरुकुल से आमंत्रणपत्र भी आया।

बसवरस के विद्याभ्यास को अंतिम चरण पर पहुँचने से उनके जीवन में परिवर्तन होनेवाला है । इस संदर्भ में कुलपति जातवेद मुनि ने उस दिन की सभा में स्नातकों के व्याख्यान की व्यवस्था की थी। जब रिश्तेदार आते हैं तब साधारण लौकिक अमीर अपने घर की संपत्ति को प्रदर्शित करने की तरह और अपने पुत्रों को दिखाकर जैसे आनंदित होता है वैसे ही सद्गुरु अपने मुमुक्षुओं और ज्ञानी स्नातकों को दिखाकर हर्षित होते हैं । कुलपति जातवेद मुनिने ज्ञान भंडार के अपूर्व रत्न प्राय बसवेश्वर के व्याख्या के द्वारा उसकी प्रतिभा का परिचय भी कराया।

बसवेश्वर ने अपने आगे के जीवन की रूपरेखा देते हुए प्रतिपादन किया कि यह समझ में नहीं आता कि टुकडे टुकडों में विभाजित विकृत समाज को कैसे संघटित करना ? कैसे सुधारना ? नारियल के पेड़ की छाया जब जमीन पर पडती है तब पेड़ के हरे नारियल के गुच्छे की छाया भी जमीन पर पडती है। उस छाया में खडे होकर मृदनारियल तोडने की तरह, पानी पीने की तरह अभिनय करे तो सचमुच क्या पानी पीने जैसा हो सकता है ? क्या प्यास बुझेगी ? वह केवल छाया मात्र है। सच्चे नारियल पेड़ के बगल में ही छाया रहती है। मूल सत्य हो तो छाया केवल दिखावटी मात्र है। इसी तरह धार्मिक आचरण पर विश्वास पाना है। अंधविश्वास में तल्लीन हो जाये तो सिर्फ अभिनय, थकान के अलावा वास्तविक फल, संतृप्ति नहीं मिलती। यह तो छाया में स्थित नारियल के गुच्छों को खाने जैसा है, अभिनय करके तुप्त होने जैसा है।

तीर चलाते चलाते शिकारी थकेगा, तीर नहीं
चलते चलते पथिक थकेगा, रास्ता नही
बाँसुरी बनाते बनाते मेदार थकेगा, बाँस नहीं
साँच जाने बिन थकेगा भक्त, लिंग तो नहीं ॥


अर्थ रहित आचरणों में आगे बढते हैं तो मार्ग के परिश्रम के अलावा कोई फल नहीं है । जहाँ पानी देखते हैं वहाँ डुबकियाँ लगाकर, जहाँ पेड़ देखते हैं वहाँ चक्कर लगाकर अपने को धन्य माननेवाले लोग भगवान के स्वरूप को कैसे जान सकते हैं ?

छुआछूत की कल्पना केवल एक स्थान में नहीं, विविध स्थानों में, विविध रूपों में छिपी है। स्पृश्यास्पृश्य केवल भेदभाव करने में ही नहीं, जमीन-जमीन में, जल-जल में , फूलों में, भाषाओं में, दिशाओं में, अंगांगों में, कालों में इस तरह विविध रूप में हैं। निर्विकार से बहनेवाले काल प्रवाह में अच्छा-बुरा, राहू-केतु इत्यादि भेदों की सृष्टि करके भयभीत होते हैं। सृष्टि में प्राप्त पानी में भेद बताकर विश्वास करते हैं कि "काशी की गंगा श्रेष्ठ है, उसमें स्नान करने से समस्त पाप निवारण होंगे। "यह भ्रम है कि "भगवान को समझनेवाली मातृभाषा में बुलाये तो पर्याप्त नहीं संस्कृत में बुलाना है।” सभी भाषाएँ मानव की बुद्धि शक्ति से निर्मित साधन हैं। भाव रहित संपत्ति, शब्दजाल से क्या प्रयोजन? साधारण मनुष्य भी भगवान को वश में कर ले; ऐसे सहज और सरल मार्ग का निर्माण होना चाहिए। मैं ऐसे दिव्य मार्ग के निर्माण का स्वप्न देख रहा हूँ। जीवात्मारूपी यांत्रिक दैविक लक्ष्य की ओर लगातार कदम बढा रहे हैं। सभी यांत्रिक भगवान की शरण में आये शरण हैं। इन्हें जाति, मत, पंथों की झंझट नहीं हैं। “जब ऐसे आदर्श समाज की रचना पूर्ण होगी तब मेरा जीवन सार्थक होगा। "-इस तरह बसवेश्वर ने अपने अभिप्राय व आदर्शों को प्रस्तुत किया तब सभाने मौन से सुना । जातवेद मुनि आश्चर्य तथा अभिमान से संभ्रांत हुए। जैसे बसवेश्वर ने समस्त सभा का कुतूहल खींचा वैसे ही मुख्य अतिथि के रूप में पधारे बलदेवरस के दृष्टिकोण में अधिक आकर्षक के व्यक्ति बने । सभी उस युवक स्नातक की प्रतिभा, पांडित्य, चिन्तनशीलता का सराहना करते हुए निकल पडे।

सन्दर्भ: विश्वगुरु बसवन्ना: भगवान बसवेष्वर के जीवन कथा. लेखिका: डा. पुज्या महा जगद्गुरु माता महादेवी। हिंदी अनुवाद: सी. सदाशिवैया, प्रकाशक: विश्वकल्याण मिशन बेंगलुरु,कर्नाटक. 1980.

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