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23. चोरों से गायें चुराये जाने का प्रसंग

चोरों से गायें चुराये जाने का प्रसंग

राजकीय नेता, देश के प्रधानी, धार्मिक क्षेत्रों के महागुरु, मंत्रपुरुष बसवेश्वर को उन्नत स्थान पर आसीन देखकर कई लोग जलने लगे। कभी-कभी उन्हें स्थान से अपदस्त करने अथवा भडकाने के प्रयत्नों की घटनाएँ होती थीं, लेकिन ये घटनाएँ सूर्य को ठंडा करने के लिए फेंके गये बर्फ की तरह अपने आप पिघल जाती थीं ।

विश्वगुरू बसवेश्वर के महामने के चारवाहे एक बार गायों को चराने ले गये थे । उस समय चोर आक्रमण करके गायों को खदेड़कर ले गये। तब गोपालकों ने दौडे आकर बसवेश्वरजी को स्थिति का विवरण सुनाया। मालिक चोर गायों को खदेड़कर ले गये 1 शीघ्र सेना को हमारे संग कीजिए, हम गायों को छुड़ाकार लायेंगे। बसवेश्वरने शांत तथा मंदस्मित होकर कहा कि आप में शांति समाधान रहे ।

गायों को चोर ले गये - ऐसा न कहो जी!
उसके लिए शोर शराबा न करो जी!
उसके लिए मत चिल्लाओ जी!
वहाँ खानेवाला भी संगय्या ही है।
यहाँ खानेवाला भी संगय्या ही है।
कूडलसंगमदेव एकोभाव हैं। / 32 [1]

"गायों को चुराने की बात मत बोलो। उनके घर में भी भोजन करनेवाला संगमनाथ ही है। यहाँ भोजन करनेवाला भी वही है; अपना कुछ नहीं। जनता की संपत्ति जनता को मिली ....

"आश्चर्य चकित होकर मडिवाल माचिदेव बोलते हैं कि यह खेल साधारण चोरों का नहीं; यह राजकीय षड़यंत्र है; आप के शत्रुओं से रचित खेल है। "

उस दृष्टि से भी हमें उद्रेकित नहीं होना चाहिए। आग को बुझाने के लिए आग को नहीं डालते। उससे आग बुझती नहीं। आग को बुझाने ठंडा पानी चाहिए। द्वेष से द्वेष दूर नहीं होगा; उसके लिए प्रेम की गंगा चाहिए ।

रहने दीजिए" हे गोपालक उन गायों के बछडे भूखे होंगे। अपनी माँ के न आने से निराश हुए होंगे ; बैल गाडियों में इन बछडों को ले जाकर उनकी माँ के पास उन बछडों को भी छोडकर आइए। "

विवश होकर गोपालकोंने आज्ञा का पालन किया। दूसरे दिन चोरों ने गायों को ले आकर छोड दिया। श्री बसवेश्वरजी के पैरों पर गिरकर उन्होंने पश्चात्ताप के आँसू बहाए । वे राजकीय षड़यंत्र में फँसकर इस कार्य में प्रवृत्त होने से व्यथित होकर बसवेश्वरजी से दीक्षा प्राप्त करके सद्भक्त हो गये ।

सन्दर्भ: विश्वगुरु बसवन्ना: भगवान बसवेष्वर के जीवन कथा. लेखिका: डा. पुज्या महा जगद्गुरु माता महादेवी। हिंदी अनुवाद: सी. सदाशिवैया, प्रकाशक: विश्वकल्याण मिशन बेंगलुरु,कर्नाटक. 1980.

[1] Number indicates at the end of each Vachana is from the book "Vachana", ISBN:978-93-81457-03-0, Edited in Kannada by Dr. M. M. Kalaburgi, Hindi translation: Dr. T.G. Prabhashankar 'Premi'. Pub: Basava Samiti Bangalore-2012.

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