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24. पंच पुरुष मूर्ति बसवेश्वर

बसवेश्वर के लीला

बसवेश्वर की प्रगति को देखकर कुछ विरोधियों ने कई बार उनकी हत्या करने का प्रयत्न किया। कसाई भद्रने राजकीय विरोधियों से प्रचोदित होकर अंधेरे में उनके घर में घुसकर उनकी निद्रावस्था में हत्या करने बाहर आया। लेकिन तलवार से मारने के पहले दीप के उजाले में बसवेश्वरजी का मुख देखते ही उसमें खलबली मची। वह दुखी हुआ कि दीन-दलितों के उद्धार के लिए दिन-रात चिन्ता करनेवाले बसवेश्वर को मारकर मैं किस नरक में जाऊँ ? हत्या करने के लिए मन तैयार नहीं हुआ। उसने तुरंत पश्चात्ताप से जब उनके चरणों को पकड़ा तब बसवेश्वर की नींद खली।

"मेरा नाम बोल्ला है, भद्र नाम से भी पुकारते हैं, इस हत्यारे को "

“यहाँ क्यों आये ? क्या तुम्हें कोई मदद चाहिए ? क्या तुम्हें गरीबी की तकलीफ है? "

"नहीं मेरे पिता, आप की कृपा से गरीबी का भूत हट गया है। मैं गरीब -नहीं हूँ । राजकीय प्रेरणा से आप की हत्या करने आया हुआ द्रोही हूँ, पिता ....?"

"मुझे मारे तो तुम्हें लाभ है क्या ?"

"गरीबों के भाग्यदाता, हे कल्याण राज्य के नंदादीप आप की हत्या करने का अज्ञान था मुझ में, मुझे क्षमा कीजिए। आप की सेवा करने के लिए अवसर प्रदान कीजिए।"

"वाह..... तुम्हारे जैसे हत्यारे को क्या हम सेवा में रख सकते हैं? एक सैनिकने कहा । " तब बसवेश्वर बोले,

आर्य योद्धा पानी घनीभूत होकर मोती बनता है, मोती पुनः न पानी होगा ; दूध घी बनता है, फिर से घी दूध न होगा। इसलिए मेरा यह प्यारा भद्र मेरा अंगरक्षक वीरभद्र है । बसवेश्वर ने आश्वासन दिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरा।

बिसवेश्वर का हस्त परुषहस्त था ; दैवत्व संभूत उस सस्नेह स्पर्ष ने अनेक पापियों को भी दैवत्वयुक्त कर उन्हें शरणों के रूप में परिवर्तन किया है। कवि विरूपाक्ष पंडित ने कहा है - उनमें मन, वाचन, दृष्टि, चलन और हस्त परुष होकर वे स्वयं देवमानव थे ।

पशु सदृश पुनीत कामधेनु रहे तो वह निरा पशु नहीं ।
वृक्ष सदृश अनुपम कल्पवृक्ष रहे तो वह वृक्ष नहीं ।
शिला सदृश मरुजमणि रहे तो वह तृण नहीं ।
मन वचन वीक्षण आचार कर्म पंच परुषों से
रंजित मेरे बसव हैं साधारण जन नहीं
जाऊँ शरण आप की हे दंडाधीश
मेरे प्राणेश, भवनाश, शक्तिकोश ॥

पशु रूप में यदि कामधेनु हो तो वह केवल पशु नहीं, वृक्ष के आकार में कल्प वृक्ष हो तो वह निरा वृक्ष नहीं, शिला रूप में चिन्तामणि हो तो वह शिला नहीं, घास जैसी संजीवनी हो तो वह साधारण घास नहीं; उसी तरह मानव रूप में बसवेश्वर के रहने पर भी केवल मानव नहीं । वे भक्ति के भंडार, भवनाशक शक्ति से युक्त हैं। इसे ही पहचानकर जनपदीय कवियों ने गुणगान किया

सब जाननहार कल्याण बसव ।
है बिखेर दिया शिवप्रकाश पुंज ।
जिग सारा तारक धुन में है गा उठा ।

बसवेश्वजी न केवल राजकीय दृष्टि से महान थे बल्कि क्रांति पुरुष होकर कई शताब्दियों से संचित भारतीय धार्मिक मस्तिष्क को धोने में सक्षम महामहिम थे। वे असाधारण सिद्धपुरुष थे। आप स्वयं जीवन-मुक्त नहीं हुए, दूसरों को भी मुक्ति के मार्ग पर ले जानेवाले प्रवर्तक बने । योगीजन षट्स्थल साधना के स्तर पर उन्हें भक्तस्थल पर स्थित करते हैं। परंतु यह स्थल आरोह के प्रथम स्तर का स्थल नहीं । आरोह को पूर्ण सिद्धकर पुनः अवरोह साधना में पूर्णत्व को प्राप्त होकर वे भक्तस्थल में स्थित रहे। प्रत्येक शरण ने एक-एक तरह का " स्थल” विशेष अपनाया। अजगण्णा जैसे साधक ऐक्य स्थल की तूर्यावस्था को प्राप्त कर वहीं पर मौन स्थिति में रह गये। मगर बसवेश्वरने उस अवस्था को पहुँचने पर भी वहीं पर रहना नहीं चाहा। स्वयं परिपूर्ण होने से क्या हो सकता है ? पुनः लोगों को जागृत करना है। इसी उदात्त उद्देश्य से तूर्यावस्था में अंतर्मुख होकर न रह गये ; प्रत्युत् बहिरंग में आकर इहलोक में देवत्व को उतारने का साहस अपनाया ।

ऐसे असाधारण शिवयोगी सिद्धपुरुष बसवेश्वर को 'पवाड पुरुष' (अलौकिक लीला पुरुष ) कहकर काव्यों में वर्णन किया गया है। 'पवाड' शब्द का अर्थ होता है कि असाधारण दैविक प्रसंग । बसवेश्वरने किसी क्षुद्रकीर्ति, धनोपार्जन, मूढ भक्तों से स्तुति पाने के उद्देश्य से पवाडों (अलौकिक लीलाओं) को मुखस्तुति करनेवालों से असाधारण पुरुष कहलाने के लिए नहीं किया। उन्होंने मानव प्रेम से संपूरित होकर दैविक शक्ति के सामर्रथ्य के प्रचार हेतु अनेक अलौकिक लीलाएँ कीं । उन से की गयी अलौकिक लीलाओं के लिए आत्म कथा के रूप में जो वचन हैं वे ही प्रमाण हैं

आया इस भव में बन्धु, पूर्व के विस्मरण मात्र से
आप की लीला और विनोद सूत्र से
गाकर किये गीत मैंने, लाख इक छियानबे संख्या में।
साठ तीन सौ मृतकों को जिलाकर
तैंतीस आक्षेपों में जिताकर
कर दिखाये अठासी लीला चमत्कार
मर्त्यलोक महागणों को

इस वचन में 88 अलौकिक लीलाएँ हैं; उनमें से 36 चापलूसी कुतंत्र से सम्बन्धित है; अर्थात् राजा के सामने प्रस्तुत होनेवाली शिकायतों के लिए उत्तर देकर, विरोधियों को मुँह बन्द करके राजा के प्रियपात्र बने। उन्होंने स्वयं कहा है कि 360 मृत प्राणों को जीवित किया । बसवेश्वर से संपन्न लीलाएँ दूसरी दृष्टि से वैचारिक लीलाओं के समान भी दीख पडती हैं। केवल अंध दृष्टि, श्रद्धादृष्टि कोण से अर्थ न लगाकर अनकी विचार-विमर्शा करें तो हम वहाँ वैचारिकता को देख सकते हैं, यहाँ अनेक कुछ ऐसे प्रसंग प्रस्तुत हैं -

1. जब बसव बालक था तब स्लेट को साफ करते समय पानी में गिर कापडनेवाले चाम को जीवित करने की अलौकिक लीला (पवाड)

जब बसवेश्वर के ऊपर चाम को पानी में ढकेलने का मिथ्या आरोप आया तब बसवने कहा कि "चाम्, तू उठकर सत्य बोल"। इस ध्वनि के निकलते ही चामने जीवित होकर सच्चाई को सुनाया। इसका अर्थ इस तरह होगा :

बालक बसवेश्वर सहज ही साहसी था। पानी में कूदकर चाम को ऊपर ले आया । उसने चाम के पेट से पानी निकाला। उसकी प्रथम चिकित्सा से उसमें सांस भरी । चाम को जीवित देखकर उसके माता-पिता तथा गाँववालों ने यदि कहा कि "पवाड (अलौकिक लीला) सदृश आकर जीवित किया" तो इसमें क्या आश्चर्य है ?

2. जवार को मोतियों में बदलने की अलौकिक लीला (पवाड)

बसवेश्वर की अलौकिक लीलाओं में यह भी एक विशेष लीला है। इसकी विशेषता है कि जवार के दाने को स्पर्ष करके उन्होंने मोती बनाया। इसको दैविक शक्ति की विस्मय - घटना के रूप में चित्रित करें तो एक अलौकिक लीला होगी, वैचारिक दृष्टि से उसका परिशीलन करे तो वही क्रांतिकारी घटना के रूप में दिखाई पडती है । बसवेश्वर के महामने (घर) में आतिथ्य स्वीकार करने कोई अतिथि आया होगा । वह धनी होने के कारण प्रसाद को थाली में ही छोड गया होगा। इस तरह रसोई के व्यर्थ होने के कारण बसवेश्वर दुखी हुए। दूसरी बार वही अतिथि जब भोजन के लिए आया तब थाली में मोती रत्नों को परोसा गया । अनिरीक्षित इस व्यवहार से परोसनेवाले को देखकर अतिथि पूछता है कि - ऐसा क्यों किया ? तब बोलते हैं - मोती, रत्न आप के लिए अधिक कीमती चीज हैं न ?

कीमती चीज हो तो क्या खाया जा सकता है ? अतिथि गुस्से में कहता है कि “बडे धनी हो, करोड-पति भी हो, रागी, जावर, चावल को ही खाता है न कि हीरे मोतियों को।" तभी श्री बसवेश्वर अतिथि के सामने आकर मार्मिकता से बोले -

अतिथि महोदेय, हीरे मोतियों के बिना देश जीवित रह सकता है ; किन्तु चावल के बिना जीवित न होगा। मोती रत्नों से भी कीमत है जावर (उत्तर कर्नाटक का मुख्य खुराक है जावर) ऐसी मूल्यवान वस्तु को ढिठाई से क्या बिगाडा जा सकता है ?

अतिथि का घमंड पिघल गया। तब उसके मूँह से निकल पड़ा कि "बसवेश्वर, जवार को मोती की कीमत दिलवाने का अलौकिक लीला पुरुष है।'

3. 12,000 जंगमों को थैली ले आने का प्रसंग -

काश्मीर के सपादलक्ष देश के महादेव भूपाल प्रतिदिन अनेक जंगमों को अन्नदान करता था । अनेक साधु, संत, योगी यहाँ आकर इनके आश्रय में रहकर उनकी प्रशंसा करते हुए सुख से रहते थे। इतने में श्रीबसवेश्वर के अनुभव मंडप का संस्थापन हुआ। वहाँ से अनेक धर्म प्रचारक देश के चारों तरफ फैलने लगे और बसव धर्म का प्रचार करने में लगे ।

इसी पृष्ठभूमि में एक अलौकिक लीला का वर्णन आता है। महादेव भूपाल पास बारह हजार जंगमों के रहने का समाचार पाकर बसवेश्वर भी उसी ओर यात्रा करते हैं। उनको अपने जंगम दासोह को आकर्षित करना था, इसलिए अपनी एक थैली में बारह हजार जंगमों को कल्याण में लाते हैं। महादेव भूपाल भ्रमित होता है। महादेव भूपाल और उसकी पत्नी गंगादेवीने जंगमों को खिलाये बिना न स्वयं खाने का व्रत किया था। इसलिए वे भूख से अस्वस्थ हो गये। देश के चारों ओर ढूँढने पर भी एक भी जंगम न मिलने से मंत्री चिंतित होते हैं। वे घोड़ों को दौड़ाकर कल्याण में आते हैं। जंगमों को वापस ले जाने के लिए प्रयत्न करते हैं तो वे कहते हैं- “हम यहाँ सुखी हैं।” जब बसवेश्वरजी को आकर्षित तथा परिवर्तन करना साध्य न हुआ तब एक हत्यारे को भिजवाकर बसवेश्वर की हत्या कराने की योजना करते हैं। हत्यारा उनके पास जाते ही परिवर्तित होकर छुरी फेंक देता है और उनके चरणों पर गिर पडता है। महादेव भूपाल अपने साम, दंड उपायों के निष्फल हो जाने पर स्वयं में आलोचना करते हैं कि "बसवेश्वर में और कौन सी शक्ति हो सकती है ? क्यों लोग उनके तत्वों से आकर्षित होते हैं ? -आश्चर्य से उन्हीं के तत्वों के प्रकाश में आगे बढने के लिए अपना सिंहासन अपने पुत्र को सौंपकर आप कल्याण में आते हैं । यहाँ लकड़हारे का कायक (परिश्रम) अपना कर सरल जीवन व्यतीत करता है।"

बारह हजार जंगमों को अपने बगल की थैली में छिपाकर लाने की अलौकिक लीला के वर्णन की पूर्व कथा इस तरह रही होगी - पुरोहित शाही और राजशाही दोनों आपस में मिले जुले होते हैं। राजा, पुरोहित, साधु, संतों को पर्याप्त भोजन कराते हैं। दक्षिणा देते हैं। ये धार्मिक लोग राजा महाराजाओं को महामहिम, देवगोत्र तथा दैव समान कहकर गुण गाते थे । परंतु ये दोनों समान्य जनता की संपत्ति का व्यय करने में उदार बनते थे। ये धार्मिक नेता या भेषधारी बढिया भोजन पाकर राजा के आश्रय में सुख से रहते थे । ऐसी स्थिति में बसवेश्वर का क्रांति-सूर्य प्रज्वलित होने लगा। लोगों को निरुद्योगी बनाकर केवल अपनी स्तुति के लिए उनका पोषण करने की पद्धति को बसवने उचित नहीं समझा। निरुद्योगियों आलसियों के झुंड की सृष्टि में पाप लगता है। कोई भी हो उसे कायक करना चाहिए। गुरु हो, जंगम हो, उन्हें कायक करना चाहिए। दूसरों की कमाई का खाना अपराध है। हर एक को शारीरिक हो अथवा बौद्धिक हो कोई न कोई कायक करना ही चाहिए। शायद इन्हीं विचारों को बसवेश्वरने उन जंगमों के मस्तिष्क में भरा होगा। उस तरह मस्तिष्क को धोने का कार्य धर्म प्रचारकों के द्वारा कराया होगा ; अथवा दूसरे भेष में सपादलक्ष प्रदेश में जाकर उनका मनः परिवर्तन किया होगा। तब वहाँ के रहनेवाले सभी ने अपने आलस्य जीवन से अपमानित, त्याग जीवन के लिए तैयार होकर बसवेश्वर का पीछा किया होगा। इसके अलावा बसवेश्वर के क्रांतिकारी मूल्यों के प्रसार के लिए अधिक प्रमाण में स्वयं सेवकों की आवश्यकता रही होगी। ऐसे कार्यों में लगने के बाद उन जंगमों में राष्ट्रज्ञान, कायक ज्ञान, सामाजिक ज्ञान, जीवन के उत्तरदायित्व की जानकारी आयी होगी। इसलिए फिर से सपादलक्ष जाकर आलस्य जीवन बिताने की उनमें इच्छा न रही होगी। इस तरह अपने हृदय की थैली में इस जंगम समूह को भरकर जादूजोगी की भाँति कल्याण ले आने का प्रसंग अलौकिक लीलाओं के काव्यों में चित्रित किया होगा। किसी प्रकार का जादू, चमत्कार किये बिना जनता को आकर्षित करने का यह प्रसंग बसववेश्वर की इन आलौकिक लीलाओं के प्रसंगों का चमत्कारिक वर्णन हम देख सकते हैं।

सन्दर्भ: विश्वगुरु बसवन्ना: भगवान बसवेष्वर के जीवन कथा. लेखिका: डा. पुज्या महा जगद्गुरु माता महादेवी। हिंदी अनुवाद: सी. सदाशिवैया, प्रकाशक: विश्वकल्याण मिशन बेंगलुरु,कर्नाटक. 1980.

[1] Number indicates at the end of each Vachana is from the book "Vachana", ISBN:978-93-81457-03-0, Edited in Kannada by Dr. M. M. Kalaburgi, Hindi translation: Dr. T.G. Prabhashankar 'Premi'. Pub: Basava Samiti Bangalore-2012.

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