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28. संप्रदाय भडक उठा

अंतर्जातीय विवाह से कईयों की आँखें लाल हो गयीं।

अंतर्जातीय विवाह से कईयों की आँखें लाल हो गयीं। जो न होना था सो हो गया। इसलिए कुछने रोना पीटना शुरु कर दिया। इसे धर्म विरोध, दैवद्रोह कार्य कहकर महाराज से शिकायत की। इस क्रांतिकारी घटना के लिए प्रेरणा देनेवाले बसवेश्वर से विवरण पूछा गया। उन्होंने शास्त्रीय परंपरा और स्वानुभाव प्रमाण के आधार पर समतावाद का समर्थन किया। राजा बिज्जल को अवगत कराया कि वर्ण और जाति भगवान से निर्मित नहीं बल्कि मानव निर्मित है। बसवेश्वर के विश्लेषण सामर्थ्य, समाजिक परेशानी से प्रेरित विचारों से बिज्जल के विचारों में परिवर्तित हो जाने पर आगे संभाव्य कष्ट का अनुमान जातिवादियो ने अंदर ही अंदर भय से बिज्जल से कहा कि " महाराज, वे बुनियाद का वादविवाद ही क्यों ? बसवेश्वर ने ज्ञानी, महानुभाव प्रधानी के स्थान के योग्य व्यक्ति पाया है। वे केवल निष्ठावान अधिकारी के रूप में रहने के लिए “अनुभव मंडप” के कार्यकलापों ; क्रांति के कार्य और जन जागृतियों के पागल करतूतों को संपूर्णता से त्याग दें । "

हाँ हाँ, ऐसा ही कीजिए बसवेश्वर जी । इससे आप अपने कार्यों में अधिक ध्यान दे सकते हैं।" बिज्जल ने भी वही सलाह दी। बसवेश्वर मुस्कुरा कर बोले ।

“टूटी कमर के शेर का क्या प्रयोजन ? टूटी सूँड के हाथी का क्या उपयोग है ? युद्ध से मुँह मोड सिपाही का क्या प्रयोजन है ? वैसे ही धार्मिक, सामाजिक, नैतिक, जागृति न कर सकने वाले अधिकार को पकडे रहने का भी क्या प्रयोजन ? इसलिए सेवा के बिना अधिकार में रहने के लिए मेरी अंतरात्मा नहीं मानेगी।"

महाप्रभु की सेवा तथा समीप से भी उन दरिद्रों और जातिभ्रष्टों से मिले रहना क्या सेवा है ? असंख्य जातियों को मिलाकर उन्हें 'शरण' कहने मात्र से क्या बडा साधन होगा ?" इन सब प्रश्नों को कोन्डी मंचण्णा ने सुनाया। बसवेश्वर बडी गंभीरता से बोले - " बिज्जल महाराज, जातीयता हमारे देश के लिए बड़ा अभिशाप है। जन्म से किसी को निम्न- उच्च की शिरो रखा लगाना अमानुष है। मनुष्य को व्यक्तित्व, नीति और गुणों से मापना है। ऐसे एक सुन्दर दैवी राज्य का स्वप्न मैं देखनेवाला हूँ। उस लक्ष्य की ओर जाने के अतिरिक्त दूसरी चिन्ता मुझ में नहीं है । "

'महाराज, बसवेश्वर की यह दूर की आलोचना बहुत गहरे में उतरी है। सिंहासन पर उनकी जो दृष्टि लगी है उसे निकालना क्या सुलभ है ? उसी उद्देश्य के लिए इस जन शक्ति का साधन है .......।” कोण्डी मंचण्णा का सीधा आरोप था।

" शिव, शिव यह कैसा भयंकर आरोप महाराज ? मैं इस टुकडे राज्य की अपेक्षा करनेवाला नहीं हूँ। मैंने समझ लिया कि स्त्री, सोने के लिए संघर्ष करना अर्थ रहित है । मुझ पर ऐसे अपवाद के आने पर इस स्थान में मैं नहीं रह सकता। अपने पद के लिए मेरा यह त्याग-पत्र कृपया स्वीकार कीजिए। यह कहकर राज्य के चिन्ह मुकुट, तलवार आदि निकाल कर देने गये। "

"बसवेश्वर जी यह कैसा काम कर रहे हैं। ऐसा मत कीजिए। जल्द-बाजी मत कीजिए" बिज्जल दीनता से बोले ।

'महाप्रभु, मैं कहीं भी रहूँ, देश का सेवक हूँ। अधिकार में न रहने पर भी यह सेवा अर्थात् अपने देश की सेवा तन, मन से करूँगा। मुझे अनुमति दीजिए। "

बिज्जल विवश हो गया। श्रीबसवेश्वरजी अधिकार परित्याग करके महामने की ओर चले ।

इसी से चापलूसियों का मन शांत नहीं हुआ। " कोण्डी मंचण्णा और नारायण क्रमितने ऐसी सलाहें दीं कि बसवेश्वर अधिकार त्याग करने के बाद कल्याण में ही रहें तो उनके अधिकार त्याग का समाचार सुनकर लोग भडक उठेंगे। इसलिए उनको शीघ्र राज्य से निर्वासित करें तो आप के सिंहासन की सुरक्षा रहेगी। बिज्जलने उसी तरह बसवेश्वर को निर्वासन की आज्ञा भेजी ।"

कुटिल लोगों के षडयंत्र पर स्वयं विचार किये बिना ही बिज्जलने बसवेश्वर को निर्वासन की आज्ञा दे दी। बसवेश्वर ने मौन होकर उसे स्वीकार कर सूर्योदय के पूर्व ही कल्याण के किले के महाद्वार को पार कर चल दिये। निरपराधी शरणों को अन्याय न होने की देखभाल करने तथा शरणों की और साहित्य की रक्षा करने का भार चन्नबसवण्णा और मडिवल माचिदेव को सौंप कर सभी शरणों से बिदा लेकर चले। वह दिन राक्षसनाम संवत्सर के फाल्गुनमास द्वादशी का दिवस था

कल्याण देश के भाग्य रवि को बिदा करने की तरह दुखतप्त शरण समूहने बसवेश्वर को बिदा किया । बसवेश्वर उस कूडलसंगम क्षेत्र की तरफ चले जहाँ उन्होंने अपने बाल्य जीवन के मधुर क्षण बिताये थे ।

मतिभ्रष्ट बिज्जलने न्याय देने का पूर्ण स्वतत्र्य कोण्डी मंचण्णा, नारण क्रमितों को दिया। उन्होंने हरलय्या, मधुवरस, शीलवंत को मरणदंड की आज्ञा दी । बसवेश्वर के निर्गमन के दूसरे ही दिन शरणों को बन्दी बनाकर उनपर मुकद्दमा चलाया। निरपराधी शरणों पर दैवद्रोह, शास्त्रद्रोह का अभियोग लगाकर उनकी आँखें निकलवायीं। फिर भी अपने अपराध को न स्वीकार करने से उनको हाथी के पैरों में बंधवाकर पेट के बल खिंचवाने का विशेष क्रूर मरणदण्ड की फाल्गुणमास के दिन आज्ञा दी। राजा बिज्जल के इस अनुचित निर्धार से लोग क्रोधित हुए। जगदेव, मल्लण्णा, भोम्मण्णाने पूर्णिमा के दिन बिज्जल राजा का वध कर डाला ।

इन हुतात्मा शरणों ने अपने सिद्धांत के लिए प्राणार्पण करके साहित्य के आंदोलन में ध्रुव नक्षत्र की भांति शाश्वत होकर लोकगीतों में मुखरित हो गये

बन पुष्प वृष्टि, पुष्प रथ पर आरूढ
बने वे पुष्प शिवपाद में
पहुँचे शिवशरण पावन माला में ।

निम्नकुल के हरळय्या
बने आप वरशरण
दिया आशीष जीतकर परमत
हर प्रीत हो आदर से उन्हें ले गये साथ ।

हर के शिखर पर उद्भूत एक सुचंदन वृक्ष
मुकुट पर दो शुक बैठे
गाये हरळय्या नाम प्राचीन कथा ।

सन्दर्भ: विश्वगुरु बसवन्ना: भगवान बसवेष्वर के जीवन कथा. लेखिका: डा. पुज्या महा जगद्गुरु माता महादेवी। हिंदी अनुवाद: सी. सदाशिवैया, प्रकाशक: विश्वकल्याण मिशन बेंगलुरु,कर्नाटक. 1980.

[1] Number indicates at the end of each Vachana is from the book "Vachana", ISBN:978-93-81457-03-0, Edited in Kannada by Dr. M. M. Kalaburgi, Hindi translation: Dr. T.G. Prabhashankar 'Premi'. Pub: Basava Samiti Bangalore-2012.

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