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7. मोह के बन्धन से उस पार

बालक बसवेश्वर सत्य के अन्वेषक

बालक बसवेश्वर सत्य के अन्वेषक, अन्ध संप्रदायों, शुष्क रूढियों का विरोधी बनकर माता-पिता के मोह पाश को तोडकर घर से बाहर निकल पडे । उस तरफ बहन अक्कनागम्मा गंभीर चिन्ता करने लगी। उसके मात-पिता, समाज के सगे-सम्बन्धियों ने जैसा समझा था वे बसवेश्वर उद्दंड न थे । वे अविवेकी भी न थे। सत्य को शुद्ध मन से स्वीकार करने में जितना धैर्यवान थे उतना ही साहसी भी। उन से पूछे जानेवाले पश्न कई बुद्धिमान मस्तिष्कों में कभी-कभी उदित होते थे, फिर भी वे बलपूर्वक उनको दबाकर संप्रदाय की आड़ में शरण लेना चाहते थे।

"यह भविष्य में अवश्य महापुरुष होगा। मुझे अकेले उनका साथ देना चाहिए। उसके बुद्धिमान विचारों को प्रोत्साहित करना चाहिए ....” ऐसा निर्णय लेकर दृढ विश्वास से केवल अक्कनागम्मा ने उसक पीछा किया।

" वह कभी -कभी बोलती थी कि बसवरस तुम साधारण नहीं हो । दूसरे बालको की तरह खेल-कूद, खाने-पीने में लीन रहने की अवस्था में तुम धर्म, समाज की चिन्ता में रहते हो। तुम्हें महान उद्देश्य की साधन करना चाहिए।

वे कहते थे कि " दीदी, मैं जिस मार्गपर जाना चाहता हूँ क्या वह दुर्गम नहीं है ? "

"बसव तुम्हारा उद्देश्य महान है मगर हमारे लोगों के मैल जमे सड़े दिमागों को शुद्ध करने का प्रयत्न बहुत कठिन है। मालूम नहीं उसको तुम कैसे साध सकते हो ?”

"बकरे को जो बोझ होता है वह हाथी के लिए एक तृण के समान है। मनुष्य की दृष्टि से जो असाध्य है वह भगवान की दृष्टि से असाध्य नहीं है। उसके हाथों में अपने को समर्पित कर लो। सचमुच तुम्हारी ओर से नामुमकिन को मुमकिन कर देगा ।"

"वह तो ठीक है, अब तुम्हारी यात्रा आगे कहाँ ?"

"मेरे स्वतंत्र विचारों को उचित परिसर जहाँ मिलेगा...."

"यहाँ देखो, हमारे कुल देवता है कूडलसंगमेश्वर । कूडलसंगम पर एक गुरुकुल है न । जातवेद मुनि उसके कुलपति हैं। वहाँ जातिभेद नहीं है। विद्यार्जन के लिए सबको समान सुविधाएँ हैं। गुरु उन्नत विचारवाले हैं। यज्ञ-याग आदि वैदिक आचारों को वहाँ स्थान नहीं है। तुम्हारे विचारों से अवश्य संतुष्ट होंगे। मुमुक्षों के प्रति उनका विशेष स्नेह है। और मेरी ससुराल गाँव ब्रह्मपुरी भी संगम क्षेत्र के समीप है । कभी-कभी वहाँ आ जा सकते हो। खिलनेवाले कमल की कलियों को ठंडे पानी के जलाशय में डालने से जैसे अपनी पंखुडियाँ खोलकर खिलने लगती हैं वैसे ही तुम्हारे व्यक्तित्व का विकास वहाँ होगा ......

"हाँ दीदी, तुम्हारी बात सही है ; पिछली बार जब मैं पिताजी के साथ आया था तब वहाँ का पर्यावरण, प्रशांतता मुझे बहुत अच्छी लगी। जातवेद मुनियों का व्यक्तित्व उतना ही दिव्य-भव्य है । कर्मकांड के पंक में नहीं फंसे हैं। ज्ञान के नंदनवन में विहार करनेवाले सात्विक योगी हैं। मैं वहीं पर जाऊँगा।"

बसवरस का उत्साह, पंख खोलकर उड़ा। संगम क्षेत्र की तरफ कदम बढाया । कृष्णानदी को नाव से पार करते समय में संगमेश्वर मंदिर का कलश गोपुरों को देखकर बसवेश्वेर पुलकित हुए। नदी में स्नान करके भीगे वस्त्रों को पहनकर, सीढियों पर चढकर, मंदिर की ओर चले। मंदिर के अंदर कदम रखते ही आनंद की लहरें उमड़कर बहने लगीं 1 केवल अभिषेक, भस्म, फूलों से अलंकृत शिवलिंग मनोहर शोभायमान था । उस क्षेत्र के चारों ओर शांतवातावरण, आश्रम का पर्यावरण, निस्तब्ध गंभीरता जगत को साक्षीभूत होकर देखने की तरह खड़ा है संगमेश्वर लिंग। इन सबने बसव को आश्चर्य विभोर कर दिया । पूर्वस्मरण के प्राप्त होने की भांति कितने ही सालों तक स्वयं अपने निज स्थल से दूर रहने के बाद फिर से उससे मिलने का सा संतोष हुआ। तब बसवेश्वर भाववेश से गाने लगे

" हे देव देव अनाथनाथ, अनिमित बन्धु, हे माता, हे पिता, बन्धु-बान्धव, मेरे कुल बल, ममता के क्रोड, आखों की ज्योति, मेरी सुमति, मेरे पुण्य-प्राण आप मेरी रक्षा करें ।"

जन्मदात्री माता से दूर होकर सौतेली माता की पीड़ा से थके बच्चे को असली माता की गोद के मिलने की तरह उसका भाव हो गया। अति भयंकर सांप्रदायिक बन्धनों से बाहर आकर शुद्ध हवा लेने की तरह उनकी स्थिति हो गयी। शब्दातीत आनंद उनकी आँखों से नीर बनकर बहने लगा ।

हाय रे शिव तुम्हें किंचित करुणा नहीं
हाय रे शिव तुम्हें किंचित कृपा नहीं
मुझ दुखी इह लोक से
दूर जो परलोक से
क्यों पैदा किया
मुझे छोड़ मिले नहीं क्या
अन्य पेड़-पौधे, कूडलसंगम देव ॥

मैं तुम्हारी शरण में आया
समझकर तुम्हें भवरोग वैद्य
दया करो हे लिंग पिता मुक्तिदायक
मेरा मन पुकार रहा
हर हर महादेव जय जय महादेव।
भज रहा शरण तुम्हारी
कि मेरा मन कूडलसंगम देव !

परम सुख को मन लाख चाहने पर
इच्छा करने पर मिलेगा नहीं जी,
ऊँचे ताडवृक्ष को हाथ लगाकर
ऊपर देखते देखते गर्दन दुखने लगा,
हे! कुडलसंगमदेव सुनिए।
जब तक आप देते नहीं वह नहीं मिलता।


अंतरंग की भावगंगा शब्दों के द्वारा बिना रोक-टोक बहती रही

इतने में प्रात: काल की पूजाविधियों को पूर्ण करने के बाद कुलपति जातवेदमुनि के हृदय में एक तरह की अनिर्वचनीय धडकन होने लगी। इसे शिवप्रेरणा समझकर मंदिर की ओर निकले। मंदिर के अंदर आकर खडे हुए तो जलते हुए दीपों की पंक्ति में तेज पुंज की तरह चमकता हुआ एक बालक पद्मासन लगाकर बैठा है। उसे बाहर का ज्ञान नहीं । एक अमूल्य हीरे को पाकर जौहरी को जैसा आनंद होता है वैसा ही बालसूर्य की तरह अपूर्व कांति से शोभित लड़के को देखकर जातवेद मुनि को अनुभव हुआ। बालक को थोडी देर मौन देखने के बाद धीर-धीरे पास आकर वात्सल्य से उसके सिर पर हाथ रखकर संवारने लगे। यह साधारण नहीं है। "अवश्य ही लीला पुरुष है है" का बोध उनमें उदित हुआ।

वे बसव से कहते हैं -

" हे भक्त तुम कहीं मत जाओ, किसी तरह की चिन्ता मत करो, संगमेश्वर को नये पुष्प जलोदक लाकर क्रम से पूजा करो, प्रसाद स्वीकार करके सुखी रहो"

गुरु की श्रीवाणी सुनकर बसव को लगा कि अपने अंतरंग की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो रही हैं। उन्होंने आनंद से नमस्कार किया। गुरु के पास जाकर अपना परिचय देकर विद्यार्जन में लग जाने की अपनी इच्छा प्रकट करना चाहते थे। परंतु उस इच्छा के अत्यंत सहजता से भागवन के संकल्प के अनुरूप सफल होने से सचमुच उन्हें आश्चर्य हुआ । बहन अक्कनागम्मा की उन बातों को सत्य होते जानकर आनंदित हुआ कि उनकी जीवन-नौका किसी दैवी शक्ति के अदृश्य हाथों में परिचालित हो रही है।

सन्दर्भ: विश्वगुरु बसवन्ना: भगवान बसवेष्वर के जीवन कथा. लेखिका: डा. पुज्या महा जगद्गुरु माता महादेवी। हिंदी अनुवाद: सी. सदाशिवैया, प्रकाशक: विश्वकल्याण मिशन बेंगलुरु,कर्नाटक. 1980.

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