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15. वैवाहिक जीवन

वैवाहिक जीवन

केश मुडाकर दूल्हा बन बैठा
प्रभो बेशरम हो कर भी
लिंग को संप्रीत करूँगा मैं
लाज रहित हो कर भी
लिंग को संप्रीत करूँगा मैं
पडोसी सांसारिक रहे उडाते हंसी मेरी
तुम्हारी शरण में आया हूँ प्रभो कूडलसंगम देव ।

बसवेश्वर विवाह मुहूर्त के कुछ क्षण पहले ही गहरे ध्यान में लगे हुए हैं। उनकी भगवान से प्रार्थना है कि वैवाहिक जीवन से अपना आदर्श मिथ्या न बने। परिवार के कुछ -लोग उपहास्य करते हैं कि विवाह के अवसर पर दूल्हा कल्पना हास्य में तैरने के बदले सन्यासी की भांति ध्यानमग्न है। विवाह तो सांगोपांग संपन्न हुआ। प्रधानामात्य के दामाद होत हुए भी बसव गर्व किये बिना सरल जीवन बिताते थे -

चलने में, बोलने में कहत संग शरण ।
पहनने में, खाने में कहत संग शरण ।
देने में, मांगने में कहत संग शरण ।
आरंभ में, धारण में कहत संग शरण ।।


भगवान में दृढ श्रद्धा रखकर नीलगंगा के साथ वैवाहिक जीवन आरंभ करत हैं ।

विवाह संपन्न होकर चार पाँच दिन हुए होंगे। एक दिन बलदेवरस से बातें करते हैं - "ससुरजी, स्वयं उपार्जित धन श्रेष्ठ है, पिता का उपार्जित धन मध्यम है, स्त्री सम्बन्ध से प्राप्त ससुर की संपत्ति अधम है।” इसलिए विवेकशील व्यक्ति दूसरों की उपार्जित संपत्ति पर जीवन गुजारना नहीं चाहते । मैं"कायक को ही कैलास मानने के तत्व को अनुष्ठान में लाना चाहता हूँ। " बसवेश्वर, क्या मैं तुम्हारे लिए दूसरा हूँ ? तुम दोनों के अलावा मेरी संपत्ति का उपयोग और कौन करेगा ?

मेरा कहना यह नहीं कि आप मुझ से भिन्न हैं । ससुरजी, जो कुछ मैं कमाता हूँ सिर्फ उसे खाने का अधिकार मुझे है । आप कृपया अपना विचार बदल लीजिए कि आप की पुत्री और मैं ही आपकी संपत्ति के खाने के अधिकारी है । परिश्रम करने का सामर्थ्य मुझ में है इसलिए मैं परिश्रम करके ही खाऊँगा । निर्बल, दीन-दुखियों की सेवा में आप की संपत्ति का सदुपयोग हो जाये.

उद्योगम् पुरुष लक्षणम् । शक्तिशाली आदर्श पुरुषों में ये गुण रहते हैं -

उद्यमः साहस धैर्य बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत् ॥

“जहाँ ये छ: गुण होते हैं वहाँ दैविक सहायता का लक्ष्य हो जाना साध्य है । कृतयुग से कालमान का प्रारंभ होता है। जगत् के सृष्टिकर्ता भगवान कार्योन्मुख है तो मैं क्यों कार्योन्मुख न होऊँ ?” “ बसवेश्वर, तुम तो स्वभावतः अध्यात्म-जीव हो । उद्योग में लग जाये तो काफ़ी समय व्यर्थ होगा । इस समय को भी पूजा के लिए विनियोग कर सकते हो न .....

" सत्य है, ससुरजी मगर पूजा आत्मोन्नति के लिए की जाती है । समष्टि की उन्नति के लिए करनेवाला शारीरिक तप, कायक (कर्म) के बिना न किसी को जीवित रहना। जब तक शरीर, प्राण, मन, आत्मा रहते हैं तब तक प्रत्येक को शारीरिक कायक, भोजन, अध्ययन, उपासना अवश्यक है।”

"ऐसा ही हो बसवेश्वर, तुम्हारी इच्छा का विरोध न कर सकता .... "

"अच्छा ससुरजी, मैं कल आप के साथ महल में आऊँगा मगर आप किसी प्रकार का दबाव लाकर अद्योग दिलवाने की कोशिश न करें। स्वयं प्रतिभा के आधार पर ही अपना काम ढूँढ लेना है । ढोकर ले जानेवाला कुत्ता क्या खरगोश को पकड़ेगा ?"

और एक चिन्ता मुझे सता रही है। मेरी संपत्ति अधिक है। नीलगंगा इकलौती पुत्री है । तुम ठुकरा रहे हो । अब बाकी रहा एक ही मार्ग । कल्याण नगर के चारों तरफ़ धर्मशालाओं का निर्माण करके उस धन से आनेवालों को भोजन की व्यवस्था करेंगे। तुम्हें यह स्वीकार है क्या ?

'ससुरजी, यह एक दृष्टि से देश द्रोह करने की भांति है "

"कैसा विचित्र है, वह कैसे ?"

“कामचोर, गूँडे, मुफ्त का भोजन मिलने का समाचार पाते ही वहाँ आकर आश्रय लेते हैं और आलसी बनकर समय गुजारते है। हम ही उनके आलसी बनने के कारण होते हैं । उसको बदले कृषि आय बढाने, विविध उद्योगों की योजना तैयार करके कायक का सदुपयोग कर लेना होगा। अपने-अपने अन्न को खुद कमाने का मार्ग लोगों को दर्शाना है । अन्न का मूल्य समझने के लिए परिश्रम करना आवश्यक है ।"

बलदेवरस ने उद्गार किया कि "तुम्हारी बुद्धिमत्ता अद्भुत है, बसवेश्वर तुम साधारण नहीं हो । "

कितने भी समय से पत्थर पानी में रहे तो, क्या हुआ?
भीगकर भी क्या कोमल होगा?
कितने भी समय से आपकी पूजा करने से क्या हुआ?
यदि मन में दृढ़ता नहीं है तो?
गुप्त धन की रक्षा करनेवाले पिशाच की तरह
मेरी स्थिति हुई है हे कुडलसंगमदेव । / 90[1]

सन्दर्भ: विश्वगुरु बसवन्ना: भगवान बसवेष्वर के जीवन कथा. लेखिका: डा. पुज्या महा जगद्गुरु माता महादेवी। हिंदी अनुवाद: सी. सदाशिवैया, प्रकाशक: विश्वकल्याण मिशन बेंगलुरु,कर्नाटक. 1980.

[1] Number indicates at the end of each Vachana is from the book "Vachana", ISBN:978-93-81457-03-0, Edited in Kannada by Dr. M. M. Kalaburgi, Hindi translation: Dr. T.G. Prabhashankar 'Premi'. Pub: Basava Samiti Bangalore-2012.

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