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अक्क महादेवि, अक्कमहादेवि (महादेवि अक्का)

पूर्ण नाम: महादेवि
वचनांकित : चेन्नमल्लिकार्जुन
अनूठी खासियत: कन्नड़ की पहली महिला कवयित्री.


*

कामारी शिव को जीता मैंने आपकी कृपा से बसवा,
सोमधर शिव को पाया मैंने आपकी कृपा से बसवा,
नाम से स्त्री होने से क्या हुवा
भाव से पुरुष रूप हूँ बसव आपकी कृपा से
अतिकामी चेन्नमल्लिकार्जुन को फंसाकर
द्वैतभाव मिटाकर हुई उसमें एकमेव बसव, आपकी कृपा से। /1161[1]

मेरे मन का विश्वास आप पर
मेरे मन की अस्था आप पर
मेरे मन की धनिष्टता आपसे,
मेरे मन हारेगा आपसे
मेरे मन घबायोगा आपके सम्मुख
मेरा मन दुखोगा आपके सम्मुख
मेरी पंचेंद्रियां गरम लोहा पियॆ पानी की भांति
समा जायेंगी आपमें चेन्नमल्लिकार्जुन देव। /1195[1]

महादेवियक्क या अक्कमहादेवी नाम से प्रसिद्ध शरणी कन्नड़ की श्रेष्ठ वचन कवयित्री हैं, जो देव चेन्नमल्लिकार्जुन को ही पति मानकर लौकिक संसार का तिरस्कार कर विरागिणी बनी थीं।

वेद शास्त्र आगम पुराण सारे
धान कूटकर निकालि कनकी भूसा जाने जी!
इन्हे क्यों कूटते हो रे, इन्हें क्यों फटकते हो?
इधर-उधर भटकते मन पर रखोगे नियंत्रण
तो सारा शून्य है चेन्नमल्लिकार्जुन। /1225[1]

कन्नड साहित्य के कई काव्य और पुराण कृतियाँ इनके जीवनामृत के बारे में वर्णन करती हैं। निर्मल शेट्टी और सुमति महदेवि के पिता और माता हैं। जन्मस्थान शिवमोग्गा जिला के शिकारिपुर तालुक का एक गांव उडुतडि(उडुगणी) माना जाता है। कौशिक नामक राजा माहेदेवि के रूप-सौंदर्य से आकर्षित होकर उससे शादी करने का आग्रह करता है। परिस्थिति के दबाव से विवष होकर कुछ शर्तें पर महादेवि शादि कर लेती हैं। परंतू राजा कौशिक जब शर्त के विरोध में चलता है, तब राजमहल छोड़कर मल्लिकार्जुन देव की प्रिया बनकर केशांबरी होकर निकल पडती हैं। जंगलों से गुजरते हर तरह की बाधाओं को सहते कल्याण नगर पहुंचती हैं। कल्याण नगर की अनुभाव गोष्ठि में अपने धृढ़ धीर वैचारिक धारणा से सबकी प्रशंसा का पात्र बनती हैं। वहां कुछ दिन रहकर, अल्लमप्रभु देव की अज्ञा के अनुसार श्रीशैल जाकर वहीं कदली में लिंगैक्य हो जाति हैं।

भूमि की ओट की निधि के जैसे
फल की ओट के स्वाद जैसे
शिला की ओट का सेना जैसे
तिल की ओट के तेल जैसे
काष्ठ की ओट की ज्वाला जैसे
भाव की ओट में ब्रह्मरूप में स्थित
चेन्नमल्लिकार्जुन की स्थिति
आएगी नहीं समझ में। /1199[1]

अक्कमहादेवि एक श्रेष्ठ वचनकार्ति हैं। ’चेन्नमल्लिकार्जुन’ वचनांकित से लिखे उसके ४३४(434) वचन उपलब्ध हुए हैं। उनमें उनके जीवन और साधना संबंधी सभी स्तर की भाव लहरियाँ अभिव्यक्त पायी हैं। जीवन के सुख-दु:ख और अध्यात्मिक भावनाएँ विसिष्ट रूप में निरूपित हुई हैं। भाव तीव्रता के कारण ये वचन भावगीत के रूप में वचन साहित्य में अपना ही अलग पहचान रखते हैं। समकालीन शरणों ने ही इस महत्व को पहचान कर महादेवि की प्रशंसा की है। वचनों के अलावा महादेवि ने योगांग त्रिविधि, स्वर वचन, सृष्टि के वचन, मंत्रगोप्य नामक लघुकृतियाँ रचि हैं। फिर भी महादेवि के समग्र अंतरंग का दर्शन उनके वचनों द्वारा ही होता है।

अपने विनोद के लिए स्वयं सृजन किया सारा जगत
अपने विनोद के लिए स्वयं उसमें बाँध दी सारी लौकिकता
अपने विनोद के लिए स्वयं घुमा दिया समस्त भवलोगों में
यों मेरे चेन्नमल्लिकार्जुन रूपी परशिव
अपने जगद्विलास में संतृप्त होने पर
स्वयं अपना माया पाश तोड़ डालेगा। / ११९१[1]

बिना संग होती नहीं उत्पन्न अग्नि,
बिना संग बीज होता नहीं अंकुरित,
बिना संग खिलते नहीं फूल
बिना संग मिलता नहीं सर्वसुख,
चेन्नमल्लिकार्जुनय्या,
तुम्हारे महानुभवियों के संग से
मैं परमसुखी बनी। /1227 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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