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अमरगुंडद मल्लिकार्जुन (११६०)

पूर्ण नाम: अमरगुंडद मल्लिकार्जुन
वचनांकित : मागुडद मल्लिकार्जुन

देहरूपी नगर के लिए सत्य रूपी दुर्ग बनाकर
धर्मार्थ काम मोक्ष रूपी
पहरेदार जागो, जागे रहो।
भय भारी, भय भारी।
अज्ञान रूपी गाढांधकार, घना है, घना है
नव द्वारों की रक्षा करो, रक्षा करो
ज्ञान ज्योति को प्रखर करो, प्रखर करो
पंचेंद्रिय रूपी पाँच चोर ड़ाका ड़ाल रहे हैं
जाग्रत हो, जाग्रत हो।
जीव धन को सुरक्षित रखो, सुरक्षिन रखो
शाबाश हो! शाबाश!
उस नगर के मूलस्थान के शिखर के ऊपर
द्वार खोलकर, सुपथ पर चलना है स्वयंभुनाथ के पास,
इसे जानते हुए महामहिम मागुड़ के मल्लिकार्जुन देव के प्रति
सतर्कता नहीं खोना, सतर्कता नहीं खोना रे। / १४२२ (1422)[1]

अमरगुंडद मल्लिकार्जुन (११६०) ’अमरगुंड’ जो विशेषण इस नाम के पीछे है, इससे लगता है कि यह तुमकूर जिला गुब्बि के होंगे। 'मागुडद मल्लिकार्जुन’ वचनांकित से इनके दो वचन मिले हैं। एक वचन में काया रूपी नगर की रक्षा की रीति का और दुसरे में लिंग की महिमा का वर्णन हुआ है। दोनों में अनुभाव और अध्यात्म सार रूप में व्यक्त हुए हैं।

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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