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बहुरूपी चौडय्या (1160)

पूर्ण नाम: बहुरूपी चौडय्या
कायक: लोककलाकार
वचनांकित : ‘रेकण्णप्रिय नागिनाथ'

खेलना हो तो सदाचारीयों के साथ खेलना
बोलना हो तो जंगमप्रेमि के साथ ही बोलना
संवाद करना हो तो प्रसादी के साथ मिलकर ही संवाद करना
भक्तिहीन को देखते ही मन क्रोधित हो ऐसा करो
हे रेकण्णप्रिय नागिनाथ। / १८३३ [1]

बहुरूपी चौडय्या (1160) चौडय्या लोककलाकार थे। उनका जन्मस्थान रेकळिके (रेकुळगि) है। कल्याण आकर बहुरूपी कायक करते शरण जीवन बिताते रहते हैं। काव्य-पुराणों व लोकगीतों में इनका नाम लोकप्रिय है। यह प्रसिद्ध हँसोड़ थे। श्रेष्ठ वचनकार भी थे। ‘रेकण्णप्रिय नागिनाथ' वचनांकित में रचे इनके 66 वचन मिले हैं। वे अधिकतर ‘बहुरूप' वृत्ति परिभाषा में तत्वबोध करते हैं। कुछ उलटबासी परक वचन भी हैं।

सभि लोकों में शिव के रहने से भी क्या
शिवजी लोक की तरह नहिं हैं।
जग को अपने अंतर्गत करके स्वयं उससे बाहर रहने पर
क्या वह ब्रह्मांड-सा है? नहीं
आकाश की तरह सर्व लोक के
भीतर-बाहर मूल चेतना स्वयं होकर आधार बने हैं
हमारे रेकण्णप्रिय नागिनाथ। /१८३४ [1]

शिला भीतर आग को राख से रहीत बनाकर रखने जैसा
तुमने रखा मुझे लिंग के भीतर
वायू गंध के मिलन-सा रखो मुझे हे पिता
लिंग भीतर अंग को।
रेकण्णप्रिय नागिनाथ, आपकी स्नेहपूर्ण भावना
दीपक के प्रकाश के भितर छेपे तेल जैसे रखो मुझे
लिंग भीतर अंग को। /१८३५[1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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