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भोगण्णा (1160)

पूर्ण नाम: भोगण्णा
वचनांकित : निजगुरु भोगेश्वर

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हे देव, आपके शरणों का अस्तित्व
आग के हाथ के दिये के समान है;
आपके शरणों का चलन
पवन के हाथ की सुगंध के समान है;
अग्नि रूपी पीठ पर
कपूर के राजा को बिठाया जाय तो
राजा पीठ को निगलेगा?
अथवा पीठ राजा को निगलेगा? इसी न्याय के अनुसार
आँखों के पीठ पर,
सद्गुरु लिंग रूपी राजा को बिठाने पर,
वह लिंग क्या आँखों को निगलेगा?
या आँख लिंग को निगलेगी?
इन दोनों को आत्मसात् करने के सौंदर्य को, नज़ाकत को,
हे निजगुरु भोगेश्वर, आपके शरणों में देख सकते हैं। / 1880 [1]

भोगण्णा केंभावी भोगण्णा से भिन्न हैं। इनके ‘निजगुरु भोगेश्वर' वचनांकित से रचे 22 वचन मिले हैं। इन वचनों में शरण स्तुति, भवि-भक्त भेद, साकार-निराकार, अंग-लिंग संबंध, शरणसती - लिंगपति भाव और उलटबासी के लक्षण पाये जाते हैं। वचन लंबे होकर वे गद्य के लक्षण से युक्त दीखते हैं। कुछ वचनों में वेषधारी ढांबिकों, और शब्दाडंबर से जो भवभारी है। उनकी तीव्र आलोचना हुई है।

पंख कटे पक्षी जैसे,
सरसों की राशि रौंधनेवाले बैल जैसे,
प्रभात को देखकर तल्लीन हिरनी जैसे
भ्रमरों के लिए जहरीले बने चंपक पुष्प जैसे,
अपना तनमन कुल को
आपके स्मरण रूपी ज्वाला के लगने से, मरकर भी अमर रहा,
घास की रस्सी में बँधी आग जैसे,
न तपकर भी तप गया,
हे निजगुरु भोगेश्वर, आपका मिलन सुख का क्या कहें? / 1881 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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