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चेन्नय्या (17वीं शती)

पूर्ण नाम: चेन्नय्या
वचनांकित : चेन्नय्या प्रिय निर्माय प्रभु

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इष्टलिंग को नैवेद्य चढ़ाकर मिष्ठान्न स्वीकार करे तो
तृप्ति नहीं मिली क्या आपको इष्टलिंग मुख से?
उस शरण के मुख में लिंग तृप्ति दर्शित हुए बिना
अंगमुख में शरणतृप्ति नहीं झलकती,
‘वृक्षश्च वदनम् भूमि, लिंगश्च वदनम् जंगमम्’ ।
इस श्रुति वाक्य को जानकर पागल हुए मूर्खा से
आपके शरण का कहना है कि शिवलिंग की प्राप्ति नहीं,
हे चेन्नय्यप्रिय निर्माय प्रभु। / 2277 [1]

चेन्नय्या जो मादर चेन्नय्या से अलग हैं, इनके बारे में कुछ भी जानकारी नहीं मिलती है। 'चेन्नय्या प्रिय निर्माय प्रभु’ वचनांकित में रचित इनके 42 वचन मिले हैं। इन्हें 'खंडितद वचन' (निश्चितता के वचन) कहते हैं। इनमें प्रसाद, पादोदक आदि के बारे में निरूपण हुआ है।

वृक्ष का मुख भूमि है या भूमि का मुख वृक्ष है?
शरण का मुख लिंग है? या लिंग का मुख शरण है?
कोई यह रहस्य जानता है तो बतावे,
वृक्ष को पानी सींचने से असर भूमि पर होता है।
भूमि पर पानी सींचने से परिणाम वृक्ष पर होता है।
शरण के मुख में लिंग तृप्ति होती है।
लिंगमुख में शरणतृप्ति होती है।
वह लिंग मुख ही शरण है, इसे न पहचानने वाले अज्ञानियों को
शिवलिंग की तृप्ति पहले ही नहीं, ऐसा आपके शरण का कहना है
हे चेन्नय्यप्रिय निर्माय प्रभु। / 2278 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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