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दासोहद संगण्णा (1160)

पूर्ण नाम: दासोहद संगण्णा
वचनांकित : स्वयंभू से उस पार, अतिबल देखो मातुळंग मधुकेश्वर
कायक (काम): अन्न संतर्पण (दासोह) करना इनका कायक

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मटकी में पके अन्न का एक दाना काफ़ी है।
उसे सान कर देखने की जरूरत है क्या ?
गलत गुरु, लिंग बाह्य, जंगम निंदक
आचारभ्रष्ट और ज्ञान विहीन को
समझकर, सोचकर भी उसके साथ मिलने से
मांस को छोड़कर मत्स्य में आये
जम्बुक की तरह न होगा क्या?
सदाचार में पहुँचे हुए होना चाहिए।
कठोर आचार में स्थिर होना चाहिए।
शम्भु से इस ओर, स्वयंभु से उस ओर वह अतिबल है देखो
मातुळंग मधुकेश्वर। / 1796 [1]

संगण्णा बनवासी के मधुकेश्वर के भक्त थे। अन्न संतर्पण (दासोह) करना इनका कायक था। इनका वचनांकित है 'स्वयंभू से उस पार, अतिबल देखो मातुळंग मधुकेश्वर' । इनके १०२ वचन मिले हैं। इनके अधिकतर वचन दासोह के महत्व को उजागर करते हैं। अर्पित-अनर्पित, ज्ञान, आचार, भक्ति, स्वानुभाव, प्रसाद आदि तात्विक विषय का विवरण वचनों में दिया गया है।

देखनेवाले सभी खेल सकते हैं क्या?
बोलनेवाले सभी लिंगांगयोग जानते हैं क्या?
साधना करनेवाले बालक सभी युद्धभूमि में लड़ सकते हैं क्या?
इन बातों में पड़े, सांसारिकता में पड़े सभी योगी
लिंगांग में निहित योग को कहाँ जान पाते हैं?
शम्भु इस ओर, स्वयंभु उस ओर वह अतिबल है देखो
मातुळंग मधुकेश्वर। / 1797 [1]

बिल्ली का निगला मुर्गा
अपनी समय वेला पर खड़े हो कहीं आवाज़ दे सकता है?
लिंग ज्ञान पाकर चित्त
संसार के झंझट में कहीं डूब सकता है?
इस द्वन्द्व को समझकर योग सम्बन्धी होना चाहिए।
शम्भु से इस ओर, स्वयंभु से उस ओर वह अतिबल है देखो,
मातुळंग मधुकेश्वर।। / 1798 [1]

मिट्टी में जनमा सोना, पत्थर में जनमा रत्न
सीपी में जनमा मोती, वृक्ष में जनमा गंध
वे अपने स्वस्थान से आगे
परस्थानों पर जाकर गंतव्य पहुँचने के समान
पिण्डाण्ड़ में जनम पाकर अण्ड को छोड़कर
स्वयं पिण्ड बनने समान
गुरु के करकमल में जन्म पाकर
लिंग मूर्ति के सर्वांग में विकसित होकर
जंगम बनने के निरंग प्रसाद में मिलकर
अविरल बननेवाले को
बंधन, मोक्ष, कर्मों का अनुसरण ठीक नहीं होगा।
वह निरंग वस्तु है।
शम्भु से इस ओर, स्वयंभु से उस ओर वह अतिबल है,
देखो, मातुळंग मधुकेश्वर। / 1799 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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