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गजेश मसणय्या (1160)

पूर्ण नाम: गजेश मसणय्या
वचनांकित : महालिंग गजेश्वर
कायक (काम): पशुपालन (Herding)

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आलिंगन के स्पर्श सुख से दूर होनेवाले मन से भी
बंध्या बने रहना बड़ा सुख है माई
उसका आँख से देखना मन को सह्य नहीं ।
साथ रहकर कृश बनने की रीति देखो माई
पंख छूटी हंसिनी की तरह मैं हुआ
महालिंग गजेश्वर रहने पर। / 1644 [1]

गजेश मसणय्या अक्कलकोटे संस्थान के कर्जगी गाँव के निवासी थे। ये शरणसती-लिंगपति भाव के श्रेष्ठ वचनकार थे। ये कल्याण में शरणों के साथ अनुभव गोष्ठी में भाग लेते थे। अपने अंतिम समय में ये गुल्बर्गा जिला आळंद तालूक मनहळ्ळि गाँव में बसे थे और वहीं पर लिंगैक्य हुए। यहाँ इनके नाम पर देवालय है जो एक निदर्शन के रूप में है। कर्जगी का गजेश्वर इनका इष्टदैव है। इनके 'महालिंग गजेश्वर' अंकित से रचे 70 वचन प्राप्त हैं। मसणम्मा इनकी पत्नी हैं। इनके वचन सती-पति भाव की उत्कटता प्रकट करते हैं। भाषा सरल, भाव मधुर और शैली काव्यात्मक है।

उदर को छुई बात अधर से गिर न जाएँ।
इसलिए अधर को बंधकर रखा था उसने
आँखों की कोर से छूट न जाएँ
इसलिए उसने आँख बंधकर रखी थी
सुगंध न उड़ जाय।
भ्रमर को उसने समझाया था
मन बिखर न जाएँ दिनकर को
इसलिए पहरे पर रखा था आज हमारे
महालिंग गजेश्वर मिलने के संभ्रम में। / 1648 [1]

मेरी आँखों की कोर लाल हुई
मेरी बाहुएँ थकी हुई हैं
पहनी मूंग की माला सफ़ेद हो गई
मुक्ताफल माला से मैं जल गई।
आज मेरे महालिंग गजेश्वर
बहिरंग को न मानकर अंतरंग में फैल गया, देखो माँ। / 1649 [1]

हे माँ, देखो न
रात को तड़पनेवाले चक्रवाक की तरह
तड़प रही थी माँ
माघमास के कोयल की तरह गूंगी बनी थी माँ
महालिंग गजेश्वर के
अनुभाव सम्बन्धियों का आगमन
मेरे प्राण का आगमन है देखो। / 1650 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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