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गुप्त मंचण्णा (1160)

पूर्ण नाम: गुप्त मंचण्णा
वचनांकित : नारायणप्रिय रामनाथ
कायक (काम): राजा बिज्जल के मंत्री थे।

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काल को जानने के लिए मुर्गी बनाना चाहिए।
ऋतु काल को पहचानने के लिए कोयल बनाना चाहिए।
वृक्ष शाखा के लंघन से परिचित होने के लिए बंदर बनाना चाहिए।
करण की मृत्यु को पहचानने के लिए मलत्रय से दूर हुआ मैं
नारायण प्रिय रामनाथ। / 1662 [1]

राजा बिज्जल के मंत्री थे। मंचण्णा के पिता दामोदर और माँ मायादेवी थी। मूलतः वैष्णव मत के होने पर भी ये बसवण्णा के प्रभाव में आकर शरण धर्म से आकर्षित होकर गुप्त रूप में शिवभक्ति का आचरण करते थे। एक बार जब वह भक्ति भाव प्रकट हो गया तो आगे प्रत्यक्ष रूप में अनुभव मण्टप की शिवानुभव गोष्ठी में भाग लेने लगे। सारा जीवन शिवभक्ति के लिए समर्पित कर कल्याण नगर में ही ऐक्य हो जाते हैं। इनका वचनांकित 'नारायणप्रिय रामनाथ' है। इनके 102 वचन प्राप्त हुए हैं। वैष्णव-धर्म से शरण धर्म में परिवर्तित होते समय उनमें जो मानसिक पीड़ा हुई उसका चित्र वचनों में विशेष रूप से दिखाई पड़ता है। कई वचनों में उलटबासी की परिभाषा व्यक्त हुई है। इनके वचनों में प्रयुक्त संदर्भोचित उक्तियों में लोकानुभव स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

तलवार के बिना कैसे लड़ेगा?
आत्मा के बिना शरीर में चेतना कैसे रहेगी ?
अजात की नीति न जाननेवाला
निश्चय की ज्योतिमर्यता कैसे जान पाएगा?
इष्टलिंग को न जाननेवालों की बात की नीति
छेदवाले घड़े में छिपाए पानी जैसा
नारायणप्रिय रामनाथ। / 1666 [1]

लिंगसंगी होने पर पत्थर-आवला जैसे होना चाहिए।
लिंग प्राण होने पर ज्वाला-कपूर-सा होना चाहिए।
वह तद्भाव ही लिंग संग है।
वरुण-किरण युक्त मरीचिका जल-सा ।
मगर-उदक पथ-सा
नाम रहित की स्थिति नारायणप्रिय रामनाथ। / 1669 [1]

लोक के बारे में हो तो आचार की बात।
अपने लिए हो तो अनाचार की बात।
आचार सम्पन्न को हर कहीं देखा
अनाचार सम्पन्न को कहीं भी न देखा!
भक्त भवि बन सकता है।
परंतु भवि को भक्त होना आसान नहीं।
मक्खन से ही घी बनता है, घी से मक्खन नहीं बनता
पेड़ जलकर कोयला होता है।
कोयला जलकर पेड़ नहीं बनता
यह अघटित रोगरहित है
नारायणप्रिय रामनाथ। / 1670[1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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