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लिंगायत धर्मगुरु बसवण्णा (1134-1196)

पूर्ण नाम: बसवण्णा, बसवेश्वर, बसवराज, बसवय्या, बसविदेव, सांगन बसवय्या
वचनांकित : कूडलसंगमदेव
कायक (व्यवसाय): राजा बिज्जल के दरबार में वित्त मंत्री और तत्कालीन प्रधानमंत्री
अतिरिक्त विशेष लिंगायत धर्म संस्थापक तथा अनुभव मंडप के स्थापक

जहां देखो वहां प ही दीखते देव।
सारे विस्तार का रूप आप ही हैं हे देव
’विश्वतोचक्षु’ आप ही है देव
’विश्वतोमुख’ आप ही है देव
’विश्वतोबाहू’ आप ही है देव
’विश्वत:पाद’ आप ही है देव
हे कूडलसंगमदेव। -८५ [1]

जग-सा विशाल, नभ-सा विशाल
आपका विस्तार उससे बी परे है।
पाताल से भी पार तेरे श्रीचरण,
ब्रह्मांड से भी पार तेरा श्री मुकुट,
अगम अगोचर अप्रतिम हे! लिंग
कूडलसंगमदेव,
तुम मेरे करस्थल में समा गये। -२०१[1]

महात्मा बसवेश्वर भारतीय मनीषा के प्रथम बागी धर्म गुरु हैं, उनका विद्रोह अंधविश्वास और अंधश्रद्धा के विरोध में सदैव मुखर रहा है। महात्मा बसवेश्वर के काल में समाज ऐसे चौराहे पर खड़ा था, जहां चारों ओर धार्मिक पाखंड, जात-पात, छुआछूत, अंधश्रद्धा से भरे कर्मकांड, पंडित-पुरोहितों का ढोंग और सांप्रदायिक उन्माद चरम पर था। आम जनता धर्म के नाम पर दिग्भ्रमित थी।

१२ शताब्दि जो बसवेश्वर की चेतना का काल है, पूरी तरह सभी प्रकार की संकीर्णताओं से आक्रांत था। धर्म के स्वच्छ और निर्मल आकाश में ढोंग-पाखंड, हिंसा तथा अधर्म व अन्याय के बादल छाए हुए थे। उसी काल में अंधविश्वास तथा अंधश्रद्धा के कुहासों को चीर कर बसवेश्वर रूपी दहकते सूर्य का प्राकट्य भारतीय क्षितिज में हुआ।

बसवेश्वर का जन्म कर्नाटक के इंगळॆश्वर ग्राम मॆ रोहिनि नक्षत्र, अक्षय तृतिय, आनंदनाम संवत 30-4-1134 को हुवा। माता मादलाम्बिके ऒर पिता मादरस. बसवेश्वर का मृत्यु श्रावण सुद्ध पंचमि, नळनाम संवत 30-7-1196 को हुवा।

बसवेश्वर बीच बाजार और चौराहे के संत हैं। वे आम जनता से अपनी बात पूरे आवेग और प्रखरता के साथ किया करते हैं, इसलिए बसवेश्वर परमात्मा को देखकर बोलते हैं और हम किताबों में पढ़कर बोलते हैं। इसलिए बसवेश्वर के मन और संसारी मन में भिन्नता है।

मकढ़ी सूत्र से जाला बुनने की भाँति
सूत्र के लिए धागा कहाँ से लायी?
चरखा नहिं, उसके लिए रूई नहीं, किसने सूत्र काता?
अपने तन से सूत निकाल कर फैलाता है,
उसमें बढ़े प्यार से चल फिर कर,
अंत में अपने में समेटकर रखने की तरह,
अपने से निर्मित ईस जग को अपने में
समेट लेते हैं कूडलसंगमदेव। -160 [1]

आज समाज के जिस युग में हम जी रहे हैं, वहां जातिवाद की कुत्सित राजनीति, धार्मिक पाखंड का बोलबाला, सांप्रदायिकता की आग में झुलसता जनमानस और आतंकवाद का नग्न तांडव, तंत्र-मंत्र का मिथ्या भ्रम-जाल से समाज और राष्ट्र आज भी उबर नहीं पाया है।

गुरु बसवण्णा (1134-1196) 12वीं शती के शरणों के समाजिक-धार्मिक आंदोलन के नेता थे। बसवण्णा जीवन के सभी क्षेत्रों में नया आविष्कार करनेवाले युगपुरुष थे। इनके बारे में रचा साहित्य तो अत्यधिक है। बसवण्णा का जन्मस्थान बिजापुर जिले का बागेवाड़ी है। आप आगमिक शैव परिवार में जन्मे थे। पिता-मादरस और माँ मादलांबिका थीं। बसवण्णा की पत्नियाँ हैं, मामा बलदेव की पुत्री गंगांबिका और सिद्धरस की पुत्री नीलांबिका। दीदी अक्कनागम्मा थीं और चेन्नबसवण्णा अक्क नागम्मा का पुत्र और बसवण्णा का भानजा है। कर्मनिष्ठ शैव ब्राह्मण संस्कृति का विरोधकर बसवण्णा भक्तिनिष्ठ संस्कृति के कूडलसंगम आते हैं। वहाँ अध्ययन, चिंतन आदि के द्वारा अपने व्यक्तित्व का विकासकर लेते हैं। के रूप में काम करते हैं। बिज्जल के सम्राट बनने के बाद, राजा बिज्जल के साथ कल्याण आकर भण्डार के मंत्री बनते हैं। कल्याण बसवण्णा के जीवन का अति प्रधान कार्यक्षेत्र है। इस संदर्भ में शरणों का संगठन, अनुभव मण्डप की स्थापना, सिद्धांतों की रचना व प्रसार, वचन साहित्य सृष्टि आदि सामाजिक-धार्मिक कार्यो में लग जाते हैं। वर्णभेद, वर्गभेद, लिंगभेद संस्कृतियों का निराकरण कर समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व की बुनियाद पर नये समाज निर्माण के लिए आगे बढ़ते हैं। संप्रदायवादी इसका सहन नहीं कर पाते। राजशक्ति के बल पर इस आंदोलन को दबाना चाहते हैं। सत्य का आचरण करनेवाले शरणकुचले जाते हैं। इससे दु:खी होकर बसवण्णा कल्याण से कूडलसंगम आते हैं और वहीं पर ऐक्य हो जाते हैं।

अन्न का एक दाना देखते ही
कोआ अपने समूह को बुलायेगा नहीं क्या?
एक निवाल देखते ही
मुर्गी अपने कुल को बुलायेगी नहीं क्या?
शिवभक्त होकर, भक्ति पक्ष का न हो तो
वह कौए-मुर्गी से भी हीन है
हे! कूडलसंगमदेव। /152 [1]

ज्ञान के बल से अज्ञान का नाश है
ज्योति के बल से अंधकार का नाश है,
सत्य के बल से असत्य का नाश है,
पारस के बल से लोहत्व का नाश है,
कूडलसंग के शरणों के अनुभाव
के बल से भव का नाश है, देखो जी। /207 [1]

बसवण्णाने कूडलसंगमदेव वचनांकित से वचन, स्वरवचनों की रचना की। उनके उपलब्ध वचन 1404 हैं। उनके वचनों का मुख्य आशय अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य और सामाजिक उत्तरदायित्व है। बसवण्णा ने अपने आशय का समर्थ रीति से निर्वाह किया है। सरलता, वैविध्यता और ध्वन्यात्मकता का सुंदर संयोजन इन वचनों में देखा जा सकता है। भाषा में सात्विकता है। वह आत्म साहित्य का समर्थ वाहक बना है।

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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