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हडपद रेचण्णा (1160)

पूर्ण नाम: हडपद रेचण्णा
वचनांकित : निकलंक चेन्नसंगमदेव
कायक (काम): तांबूल सिद्ध करने का कायक

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भक्त! वह कैसा भक्त! जो त्रिविध मलों में मन लगाता है?
विरक्त! वह कैसा विरक्त! जो इन्द्रियों के कार्य व्यवहार में
मन लगाता हो ?
इन उभय भावों में स्थिर रहने पर
पुष्प-गंध के समान, आईना व प्रतिबिम्ब के समान
आग और कपूर के समान,
निःकलंक कूडल चेन्नसंगमदेव में ऐक्य होता है शरण! / 2180 [1]

तांबूल सेवा कायक के हडपद रेचण्णा कल्याण क्रांति के संदर्भ में शरणों के साथ उळवी तक गये थे। 'निकलंक कूडलसंगमदेव’ वचनांकित में रचे इनके ९ वचन मिले हैं। शिवभक्तों के गुण-लक्षणे, शरण स्तुति, अप्रामाणिकों की निंदा आदि इन वचनों में निरूपित हैं।

काष्ठ के बने देव को, आग की कैसी पूजा ?
मिट्टी से बनी नाव से क्या, भरी नदी को पार कर सकते हैं?
जो भगोड़ा है उसपर विश्वास कर, युद्ध में जा सकते हैं?
ऐसे गुणों की भी उपेक्षा करके,
समर्थन करने पर भी क्या प्रयोजन?
उसी तरह बेकार लोग, आचारभ्रष्ट विटपुरुष,
चर्चागोष्ठी में डूबे हुए, सदा याचना करनेवाले,
जुआ खेलनेवाले, परिहास में ही समय बितानेवाले,
त्रिविध भक्ति में दोष हूँढनेवाले, विश्वासघाती, अप्रमाण पातकी,
भक्त का रूप धारण करे तो उसे 'भक्त' मानो तो,
विरक्ति का वेष धारण करे तो उसे कर्ता मानो तो,
दीक्षा दे तो, उसे गुरु मानो तो,
उसमें, भूल हो तो दिखा दूंगा!
छिपाकर, रहस्य न खोले तो,
‘यह तुम्हें ठीक नहीं' - कहूँगा।
फिर भी इनसे लिपटकर-छोड़ते नहीं तो,
निःकलंक कूडल चेन्नसंगमदेव भी हो, तो उसे दूर रख दूंगा। / 2181 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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