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हडपद अप्पण्णा (1160)

पूर्ण नाम: हडपद अप्पण्णा
वचनांकित : बसवप्रिय चेन्नबसवण्णा
कायक (काम): तांबूल सिद्ध करने का कायक

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सभी कहते हैं अंग पर लिंग धारण करनेवाले जब समान है।
लिंग लांछन धारी सब शरण के समान होंगे क्या?
शरण का संग ऐसा है कि
परम ज्ञान की ज्वाला पहने, उसी ज्वाला को ही धारण करके
उसी ज्वाला का सेवन करके
ज्वाला को बिछाकर, उसी ज्वाला को ही ओढ़कर
शून्य बने शरण और नर समान बनेंगे क्या?
सिंह और हाथी समान होंगे क्या?
विषैल सांप और साधारण सांप समान होंगे क्या?
सुगंध पत्र और घास समान होंगे क्या?
इसप्रकार शून्य बने शरण और मर्त्य लोक के नर रूपी बकरे को।
समान है कहने से
भारी नरक में डालेगा, कहते हमारे बसवप्रिय कूडल चेन्नबसवण्णा। / 2133 [1]

बसवण्णा के खास व्यक्तियों में अप्पण्णा तांबूल सिद्ध करने का कायक करते थे। शिवशरणी और वचनकार्ति लिंगम्मा इनकी पत्नी थीं। चेन्नबसवेश्वर इनके गुरु थे। कल्याण क्रांति के संदर्भ में वेबसवण्णा के साथ कूडलसंगम तक जाते हैं। बसवण्णा की इच्छा पर नीलम्मा जी को ले आने तके बसवण्णा के लिंगैक्य होने का समाचार पाते हैं तो फिर नीलम्मा और अप्पण्णा वहीपर लिंगैक्य होते हैं। बनवासी के मधुकेश्वर मंदिर के शिवोत्सव मण्टप की शिला पर शरणों के शिल्प के साथ अप्पण्णा की मूर्ति भी है। अप्पण्णा जी ने "बसवप्रिय चेन्नबसवण्णा" वचनांकित में 200 से अधिक वचन रचे हैं। उनके अधिकतर वचन उलटबासीपरक हैं उनमें षट्स्थल निरूपण के लिए आद्यता दी गयी है। कुछ वचन कथन-शैली में हैं।

आचार के ज्ञान की परवाह न करने पर
अंग पर लिंग धारण करने का क्या प्रयोजन ?
अंधे के हाथ में दर्पण के समान
बाँझ गाय का बछड़ा पैदा होने के समान,
अंधे को आँखों का दर्द सताने के समान,
अंधी को संतान होने के समान,
कंजूस के घर के स्वर्ण के समान,
इनके जो भी करें तो क्या हुआ ?
अपनी हानि वृद्धि जाने बिना
काल, कामादियों के मुँह में फँसकर
चबाचबाकर खाने का आहार बने,
हे मेरे देव बसवप्रिय कूडल चेन्नबसवण्णा। / 2139 [1]

कुछ समय क्रीड़ा में बिताकर, कुछ समय भोग में बिताकर,
कुछ समय देखने में बिताकर,
भोजन के समय लिंग में ध्यान की बात कहता है कोई
भोजन, कर्म और संग साधने में कष्ट का अनुभव
होने की बात करने वाला और कोई
इन दोनों की दृष्टि-प्रेम में फँसे बिना पार हुआ
हमारे बसवप्रिय कूडल चेन्नबसवण्णा। / 2140 [1]

ये महाघनतत्त्व स्थिर हुए
शरण का स्वरूप कैसे वर्णन करू?
पृथ्वी से पृथ्वी का मिलन, पानी से पानी का मिलन,
अग्नि से अग्नि का मिलन, वायु से वायु का मिलन,
आकाश से आकाश का मिलन, ये सारे पंचतत्त्व अलग-अलग होकर
दुविधा में डालनेवाले मन की वृत्ति मिटकर
कर्म की झंझट से मुक्त होने वाले निश्चित निजैक्य को
नमो नमो कहूँगा।
हे बसवप्रिय कूडल चेन्नबसवण्णा । / 2141 [1]

नटों के समान गहने धारण करने से क्या हुआ?
वेश्याओं के समान देना स्वीकारने से हुआ क्या?
बहुरूपी के समान ये सब करने से क्या हुआ?
हमारे शरणों का संग जो नहीं करते।
उनके वेष धारण करने से या नहीं करने से क्या हुआ
बसवप्रिय कूडल चेन्नबसवण्णा। / 2142 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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