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हडपद अप्पण्णा की पत्नी लिंगम्मा (1160)

पूर्ण नाम: लिंगम्मा
वचनांकित : अप्पण्णप्रिय चेन्नबसवण्णा
कायक (काम): तांबूल सिद्ध करने का कायक

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अंग को भूले हुए को लिंग की आवश्यकता क्यों?
ज्ञान पाने पर संकेत की आवश्यकता क्यों ?
जो खुद को जानता है उसे ध्यान की आवश्यकता क्यों ?
जिसका मन मुग्ध हो उसे मानवों की आवश्यकता क्यों?
जो आशा रहित है उसे रोष की आवश्यकता क्यों?
कामदहन करनेवाले को परेशीनी की आवश्यकता क्यों ?
जो लौकिक चाल से अतीत है उसे बोल की आवश्यकता क्यों?
निश्चिंत जो है उसे मंत्रोच्चारण की आवश्यकता क्यों?
शून्य में जो शून्य हो गया है उसे तन भाव की आवश्यकता क्यों?
अपने को भूलकर आपको समझे शरण को
वहीं पर लिंगैक्य स्थिति मिलती है, देखो,
अप्पण्णप्रिय चेन्नबसवण्णा।। / 1352 [1]

शरणी लिंगम्मा हडपद अप्पण्णा की पत्नी थीं। इनके गुरु चेन्नमल्लेश थे। महान् अनुभावी लिंगमा के ११४ वचन,1 स्वरवचन, 1 मंत्रगोप्य उपलब्ध हुए हैं। इनका वचनांकित है 'अप्पण्णप्रिय चेन्नबसवण्णा'। इनके वचनों में तत्वबोध ही प्रमुख है। हस्तप्रति में 'बोध वचन' ही लिखा गया है। मन की चंचलता, उसके निग्रह करने की रीति, गुरु-लिंग-जंगम भक्ति, शरणों की कथनी और करनी, आचार-विचार निष्ठा, डॉभिक भक्तों की आलोचना, योग-विचार आदि लिंगम्मा के वचनों में प्रतिपादित हैं | तात्विक विषय निरूपण में भाषा उलटबासी शैली में हो तो आलोचना-विडंबना नंतीक्ष्ण और देशान से युक्त है|

भैया, नरों में जन्म लेकर
विस्मरण में पड़ी मुझको बुला लाकर
महा शरणों ने मुझे लिंग संकेत को दिखाया।
गुरु का तत्व समझाया
समझाया कि जंगम ही जग का कर्तार है।
ऐसे लोगों के तत्त्व पर मन को स्थिर किया
काया भी जीव है इसे समझा।
भवबंधन को तोड़ दिया, मन को निर्मल कर लिया।
स्वच्छ दर्पण के समान चित्त शुद्ध होने पर
आपकी छाप मुझ पर लगने पर, आपके चरणों में पड़कर
मैं निजमुक्त हुई अप्पण्णप्रिय चेन्नबसवण्णा।। / 1354 [1]

स्वामी, मैं जिन जिन भवांतरों में आयी
आपने पार कराया, उसे न समझ सकी।
आँखों को दर्पण दिखाने पर भी मैं आपको न देख सकी।
इसलिए, आप मन के लिए प्राण के रूप में आये।
तन के लिए साकार होकर दिखाई पड़े।
आपकी पहचान मिलते ही
मेरा तन गल गया, मन आपमें लीन हो गया।
मेरा मृत्युभय दूर हो गया; मेरा कायागुण नष्ट हो गया।
इंद्रिय गुण भस्म हो गया। भाव नष्ट हो गया,
इच्छाएँ सत्वहीन होती गयीं।
महादेव शरण चेन्नमल्लेश्वर के चरणों में पड़कर
मैं निजमुक्त हो गयी, हे अप्पण्णप्रिय चेन्नबसवण्णा। / 1355 [1]

इच्छा को मिटाकर, रोष को रोककर,
जगत् के मोह पाश को तोड़कर –
ईश्वर कहलानेवाले शरणों को
जग के ओछे लोग क्या जाने
अप्पण्णप्रिय चेन्नबसवण्णा। / 1356 [1]

जब तक आशा है रोष छूटता नहीं।
जब तक कामभाव है भ्रांति छूटती नहीं।
जब तक देहगुण है जीवन बुद्धि छूटती नहीं
जब तक भाव है इच्छा कम न होती।
जब तक चाल अच्छी है बात बिगड़ती नहीं
इन सबके वश में रहकर भी
इन्हें पहले ही जान गये थे ऐसा समझनेवाले
हे संदेही, सुनिए :
हमारे शरण पहले को कैसे जान गये
इच्छा नष्ट कर ली, रोष मिटा लिया
कामभाव को जला दिया, भ्रांति नष्ट कर ली।
देहगुण नष्ट कर लिया, जीवन बुद्धि नष्ट कर ली;
भाव शून्य कर लिया, इच्छा मिटा ली
इसप्रकार पहले को जानकर आगे लिंग के वश में रहे शरणों को
ये संदेही क्या जाने, अप्पण्णप्रिय चेन्नबसवण्णा। / 1357 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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