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(होडेहुल्ल) घास वाला बंकण्णा (1160)

पूर्ण नाम: घास वाला बंकण्णा
वचनांकित : धर्मेश्वरलिंग
कायक (काम): घास बेचने का कायक

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काष्ठ को अग्नि में रखने पर,
उस काष्ठ के भीतर की अग्नि ‘मैं हूँ, तुम मत आओ' कहेगी क्या ?
खुद जलकर सामने की अग्नि में समा गया।
इस तरह सामनेवाले को स्थान देनेवाले, अगम्य से प्रतिवाद नहीं।
कुम्बेश्वर में सन्निहित, जगन्नाथ को जाननेवाले! / 2214 [1]

बंकण्णा घास बेचने का कायक करते थे। इनका वचनांकित है 'कुंभेश्वर लिंग में जगन्नाथ साक्षी होकर'। 10 वचन प्राप्त हुए हैं। उनमें प्रसाद का महत्व, शुद्ध कायक और शरण स्तुति का प्रतिपादन हुआ है। कुछ वचन उलटबासी शैली में हैं।

मजदूरी और कृषि कायकों से करनेवाली,
गुरु लिंग जंगमों की सेवा, वह किस प्रकार की होती है-यह जानकर
भावशुद्ध होकर, करनेवाले सुकायकवाले का जीवन,
ऐसा होता है कि
किए गए कार्य में, किसी को भी साथ न लेकर,
जो पाया वह प्रसाद है, जो बचा है उसे आहार न कहते हुए,
उभय प्रतिपाक में हुए पाकपदार्थ को संकल्प से दूरकर,
उभय भांड को ठीक माननेवाले प्रसादी को,
प्रसाद देना चाहिए।
वह निर्माल्य नहीं; वह लिंगांग है, कुंभ का प्रसाद है।
इस संदेह को दूरकर लेनेवाले अंगभाव रहित प्रसादी को,
कुंबेश्वरलिंग रूपी, जगन्नाथ को साक्षी मानकर,
प्रमाण करता हूँ। / 2215 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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