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काडसिद्धेश्वर (1725)

पूर्ण नाम: काडसिद्धेश्वर
वचनांकित : काडनोळगाद शंकर प्रिय चेन्न कदंबलिंग निर्माय प्रभुवे
कायक (काम): पीठाधिपति (Chairperson of a Matha)

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सेवक को साल पूरा होने की चिंता
सैनिक को महीना पूरा होने की चिंता
मजूरी पानेवालों को दिन ढलने की चिंता
अपने बड़े बूढों को अन्न की चिंता ।
लिंगैक्य शरण को अपनी देह की चिंता ?
हे वनांतर्गत शंकरप्रिय चेन्नकदंबलिंग निर्मायप्रभु। / 2238 [1]

काडसिद्धेश्वर आज के महाराष्ट्र के सिद्धगिरिमठ के संप्रदाय के पीठाधिपति थे। वे अपने को 'संगमेश्वरदेव करकमल उत्पन्न शिशु मैं हूँ' कहने से संगमेश्वरदेव इनके गुरु होंगे। जायप्प देसायी की कृति 'कुवलयानंद' में इनका उल्लेख मिलता है। काडसिद्धेश्वर की कृति का नाम है 'वीरशैव षट्स्थ ल' । इसमें 500 वचनों को षट्स्थानुसार संकलित किया गया है। इनका वचनांकित है 'काडनोळगाद शंकर प्रिय चेन्न कदंबलिंग निर्माय प्रभुवे'। अधिकतर वचन उलटबासी की परिभाषा में है। इन वचनों का उद्देश्य षट्स्थ ल तत्व प्रतिपादन है। इस कृति की विशेषता यह है कि अलग अलग शरणों के नामों के नीचे उनके कायक की परिभाषा का प्रयोग कर वचनों को गुँथा गया है। इसमें उल्लेखित शरणों में कुछ लोग १२वीं शती के हो तो और एक ऐसे हैं जिनका उल्लेख कहीं भी नहीं हुआ है। उनमें पिंजार महमद खानय्या, वल्लि पीरण्णा जैसे मुसलमान शरणों का नामोल्लेखन ध्यान देने योग्य हैं। कुछ वचनों का उर्दू भाषा में होना भी विशेष बात है।

उदयकाल के सूर्य की भाँति
मेघ में छिपी बिजली की भाँति
गर्भस्थ शिशु की भाँति
धरती में छिपी निधि की भाँति
ज्ञानकलात्म के अंग से परवस्तु का दृष्टांत बनते
हे वनांतर्गत शंकरप्रिय चेन्नकदंब लिंग निर्माय प्रभु। / 2240[1]

अधम मूर्खा के आगे चाहो तो पढ़ सकते हो
मगर नहीं पढ़ पाओगे राजा मंत्री जैसों के आगे
अंधे को आईना देकर करोगे क्या?
देख पायेगा क्या यदि दृष्टि न हो तो,
हे वनांतर्गत शंकरप्रिय चेन्नकदंब लिंग निर्माय प्रभु। / 2241 [1]

पति के लिए एक लिंग तत्त्व, पत्नी के लिए अलग लिंग तत्त्व,
बच्चों के लिए एक लिंग तत्त्व, दोस्तों के लिए अलग लिंग तत्त्व
इन चारों के लिए चार लिंग तत्त्व होने से ।
नहीं कटती भवमाला
इन चारों का एक ही लिंग तत्त्व होने से
कटेगी सच ही भवमाला
हे वनांतर्गत शंकरप्रिय चेन्नकदंब लिंग निर्मायप्रभु। / 2242[1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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