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कन्नडि कायकद अम्मिदेवय्या (1160)

पूर्ण नाम: कन्नडि कायकद अम्मिदेवय्या
वचनांकित : कमळेश्वर लिंग
कायक (काम): नाई (हजाम) (Barber)

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किसी भी गोत्र जाति में पैदा होकर भी
अपने-अपने कायक में, भक्ति में, च्युति न हो ऐसा रहना चाहिए।
व्रत जो भी अपनावे
उसके आगे हिचकिचाना छोड़कर
त्रिकरण शुद्ध होकर आचरण करना चाहिए।
पर-पुरुषार्थ हेतु कटवा सकते हैं क्या अपनी नाक?
किसी बड़े बूढ़े की बात सुनकर
कर सकते हैं क्या अमंगल को ?
इस प्रकार क्रिया में भावशुद्ध होकर
भाव में दिव्य ज्ञान परिपूर्ण गुरु चर भक्ति में
चेन्नबसवण्णा ही साक्षी है कि
स्वयं को कमलेश्वर लिंग समझेगा। / 1615 [1]

अम्मिदेवय्या वृत्ति से नाई (हजाम) थे। इनके 'कमळेश्वर लिंग' अंकित में रचे 10 वचन प्राप्त हैं। हडप, आइना, कैंची, चिमटा, कंघी आदि वृत्ति संबंधी शब्दों का उपयोग कर अनुभाव को प्रकट करने की रीति प्रिय हो जाता है। उनका यह कथन कि 'व्याधि के लिए मैं राजा' यह सूचित करता है कि यह वैद्य विषय का भी ज्ञाता थे। 18 कायकों का उल्लेख करना और यह कहना कि किसी भी जाति गोत्र से आये हो, अपने अपने कायक के लिए भक्ति के लिए सूतक रहित होना चाहिए' यह इनके समता भाव का निदर्शन है।

मशाल पकड़नेवाले को संदेह होगा
न कि जलते प्रकाश को।
जगत के बीच
कामातुर होकर
जलनेवाले को अव्यवस्था होगी
न कि निज प्रसंगी, निरतिशय लिंगांगी, परब्रह्म परिणामी को
जगत् जंजाल में फंसकर परिभ्रमित होता है क्या?
इस प्रकार निजत्व को समझनेवाले को ही
कमळेश्वर लिंग कहूँगा।
उसके लिए चेन्नबसवण्णा ही साक्षी है। / 1616 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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