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करस्थल मल्लिकार्जुनदेव (1409-1447)

पूर्ण नाम: करस्थल मल्लिकार्जुनदेव
वचनांकित : परमगुरु शांतेश

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अंतरंग में अत्मज्ञान नहीं है तो,
बहिरंग में क्रियाओं के होने से क्या प्रयोजन ?
वह अंधे के जीवन के समान है।
बहिरंग में क्रियाएँ नहीं हैं तो,
उसके अंतरंग में ज्ञान हो तो क्या प्रयोजन ?
वह शून्यालय के दीप के समान है।
होना चाहिए तादात्म्य अंतरंग ज्ञान और
बहिरंग क्रियाओं में जैसे -
‘अंतर्ज्ञान बहिःक्रिया एकीभावो विशेषतः’
जो महात्मा अंतरंग में ज्ञान और बहिरंग में क्रियाओं को साधता है।
वही भक्त है, माहेश्वर है, प्रसादी है, प्राणलिंगी है,
शरण है, ऐक्य है।
वह स्वयं हमारे परमगुरु शांत मल्लिकार्जुन है। / 2235 [1]

'ब्रह्माद्वैत सिद्धांत षट्स्थलाभरण' नामक कृति के संकलनकार मल्लिकार्जुन देव के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती। करस्थल परंपरा के शांतेश इनके गुरु थे। ‘परमगुरु शांतेश' अंकित से इनके चार वचन उपलब्ध हैं। उनमें इष्टलिंग में निष्ठा न रखनेवालों पर आलोचना, संसारिकता में पड़े हुओं की रीति, अंतरंग में ज्ञान न होने पर बहिरंग में क्रियाशीलों की समीक्षा और परशिवयोगी का स्वरूप वर्णन किया गया है।

सागर के भीतर के ओले काटकर
आधार स्तंभ बनाकर, उसमें घर बनाकर,
रहना संभव है क्या?
जलते कर्पूर की पेटी बनाकर,
उसमें सुगंध भरने अनुलेपन कर,
कोई सुखी रहना संभव है क्या?
वायु में स्थित सुगंध का
गजरा बनाकर नालों में सजाना संभव है क्या?
मैदान के मृगजल को गगरी में भर
लोकर, पकाकर खाना संभव है क्या?
आपके स्वरूप ज्ञान से ज्ञानी बन
परवश हो अपने में तल्लीन होने वाले
परशिवयोगी को पुनर्जन्म कहाँ
हे परमगुरु शांत मल्लिकार्जुन ? / 2236 [1]

पत्नी को देख आनंदित हो
पुत्रों को देख हर्षित हो
अतीव आनंद विभोर हो
सुधबुध खोये
बुद्धिहीन पागलों को क्या कहूँ।
मेरे परमगुरु शांत मल्लिकार्जुन ? / 2237 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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