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कोल शांतय्या (1160)

पूर्ण नाम: कोल शांतय्या
वचनांकित : पुण्यारण्य दहन भीमेश्वरलिंग
कायक (काम): पशुपालन (Herding)

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धनुष-बाण और भिक्षा पात्र पकड़कर
शिव की लीलावेष धारण कर
अन्न की तृप्ति के लिए घूमना बाललीला नहीं तो
शिव भाळाम्बक की रीति है क्या?
निस्सार बातें छोड़कर तीन अक्षरों का मूल अर्थ जानो
पुण्यारण्य दहन भीमेश्वर लिंग निरंग संग। / 1628 [1]

कोल शांतय्या पशुपालन का कायक करते थे। इनका नाम वचन साहित्य में प्रसिद्ध है। सकल पुरातनों के तीन प्रकार के वचन संग्रहों में पहला संग्रह इनके वचन से आरंभ होता है | चेन्नबसवपुराण, भैरवेश्वर काव्य के कथामणि सूत्र रत्नाकर आदि कृतियों में इससे संबंधित कथा निरूपित है। 'पुण्यारण्य दहन भीमेश्वरलिंग' वचनांकित से रचे 103 वचन उपलब्ध होते हैं। अधिकतर वचन उलटबासी के रूप में हैं। भक्ति का स्वरूप, सद्गुरु की रीति, ढोंगीपन की परिभाषा का सार्थक उपयोग किया है।

गाय से लेकर चतुष्पादी सभी जीव
अपने निष्क्रमित रास्ते को सँघकर
जैसे अपनी जगह लौट जाते हैं,
वैसी आपकी रीति नहीं, पशु की बुद्धि जैसी गति नहीं।
अपने मूल को ही भूला बद्ध जीव मैं हूँ,
जीव-काया का संबंध छुड़ाओ।
बिन्दु स्थिर होने की रीति बताओ
पुण्यारण्य दहन भीमेश्वर लिंग निरंग संग। / 1630 [1]

जटा जूटा, सिर मुंडन जैसे भी हो
आचरण-उपदेश सिद्धांत हो तो काफ़ी है
वह परंज्योति गुरु है।
उस स्थिति को तुम अपने आप जानो
पुण्यारण्य दहन भीमेश्वर लिंग निरंग संग। / 1631 [1]

निर्मल जलस्थान में रहने से क्या हुआ,
लाने के लिए घट न हो तो?
ज्ञान की बात भवियों के बोलने से क्या हुआ,
वे लिंगधारी ही नहीं हो तो?
अपनी सीमा को पहचानकर वहाँ पर
पहुंचाने वाले की तरह
तुम अपने आप को जानो।
पुण्यारण्य दहन भीमेश्वर लिंग निरंग संग। / 1632[1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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