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कूगिन (पुकारु) मारय्या (1160)

पूर्ण नाम: कूगिन (पुकारु) मारय्या
वचनांकित : महामहिम मारेश्वर
कायक (काम): पहरा देने का कायक (Guard, Patrol)

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धनुष की डोर और दंड दोनों के झुकने से
बाण छोड़ने में मदद मिली।
भक्ति और विरक्ति के मिलने से
परवस्तु को समझने में मदद मिली।।
परवस्तु त्रिकरण में मिले रहने से
त्रिगुण नष्ट हुआ।
उस नाश में पंचेन्द्रिय का नाश हुआ
सप्तधातुओं का विसर्जन हुआ,
अष्टमद का समूह नाश हुआ।
सोलह उपचार अंकुरित हुए, पच्चीस तत्व नष्ट हुए
सद्भावना की निष्ठा तन्मय हुई।
इस प्रकार इनकी मूल वासना पथभ्रष्ट हुई।
अपने को जानने के बाद ।
मैं अपने कुलाभिमान से दूर हुआ
महामहिम मारेश्वर को जानने पर। / 1626 [1]

पहरा देने का कायक इनका था। कल्याण क्रांति के संदर्भ में ये शरणों की रक्षा की जिम्मेदारी लेते हैं। ये राजा की सेना के आने की सूचना बड़ी आवाज़ से देकर सर्तक करते थे। शरण और बिज्जल की सेना के बीच मुरगोड़ के पास संपन्न लड़ाई में लड़ते मर जाते हैं। 'महामहिम मारेश्वर' वचनांकित से रचित इसके 11 वचन मिले हैं। षट्स्थल का स्वरूप, निज भक्त की भावना आदि विषयों का प्रतिपादन उनमें हुआ है।

अभ्रक के लिए लेपन है।
अश्मा की दीप्त किरणों को लेपन होता है क्या?
सांसारी को ही प्रकृति सहज राग-द्वेष होते हैं।
मन महत् में स्थित लिंगांगी के लिए।
इस उभय का संबंध है क्या?
इस गुण की रीति लिंगांगी का संग होता है।
महामहिम मारेश्वर। / 1627 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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