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कुष्टगि करिबसवेश्वर (1700)

पूर्ण नाम: कुष्टगि करिबसवेश्वर
वचनांकित : अखण्ड परिपूर्ण घनलिंग गुरु चेन्नबसवेश्वर
कायक (काम): कल्मठ के स्वामी (Swamy)

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पुराने समय में हनुमान ने लंका लाँघा, समझ कर
आज बंदर चबूतरा लाँघने की भाँति
राजकुमारी अटारी पर चढी तो
कूड़े पर चढ़नेवाली नौकरानी की भाँति
राजकुमार घोड़े पर सवार होते देख
बंदर कुत्ते पर सवार होने की भाँति ।
मदमत्त हाथी को सोमवीथी में घुसकर लूटते देख
बकरा मस्ती तानकर भीलों की बस्ती में घुस,
अपना गला तुड़वाने की भाँति
बहुत प्यार करनेवाले पति को छोड़
परदेस के विट को सराहती वेश्या की भाँति
आलतू-फालतू वस्तुओं को पूजती निर्लज्ज स्त्री नकटी का
मुख देखा नहीं जाता, शिव साक्षी है।
हे अखंड परिपूर्ण घनलिंग गुरु चेन्नबसवेश्वर। / 2257 [1]

ये कुष्टगि करिबसवेश्वर कोप्पळ जिला कुष्टगि नगर के कल्मठ के स्वामी थे। ये निडुमामुडि पीठ परंपरा के थे। इनके गुरु थे पट्टकंथा चेन्नबसवेश्वर । 'अखण्ड परिपूर्ण घनलिंग गुरु चेन्नबसवेश्वर' अंकित से इसके 19 वचन मिले हैं। उन्हें 'चित्त सद्गति वचन' कहा गया है। गुरुस्तुति, अष्टावरण की महति, साथ में स्थावर लिंग पूजक, तिथि-वार देखनेवाले, डांबिक भक्त और दुराचारियों की आलोचना की गयी है। प्रादेशिक भाषा का उपयोग, सहज दृष्टांत, खुले मन से निंदा, और सरल नीतिबोध इन वचनों की विशेषता है।

पत्नी को छोड़कर वेश्या के मोह में पड़नेवाले
उस नीच कुलीन को रे मन सिर उठाकर भी नहीं देखना,
वह गुरुद्रोही, लिंगद्रोही, जंगमद्रोही, प्रसाद द्रोही और शिवद्रोही है।
वह पंच महापातक करनेवाला पाखंडी है।
उसका मुख देखा नहीं जाता, देखो शिव साक्षी है।
हे अखंड परिपूर्ण घनलिंगगुरु चेन्नबसवेश्वर । / 2260[1]

शहद में गिरी मक्खी जैसे ।
जंगल में आँख बाँधकर छोड़े हुए पागल जैसे
हड्डी काटते कुत्ते जैसे ।
अमेद्य खानेवाले सुअर जैसे
रे मन मत बरबाद हो, सुंदरियों के पीछे पड़कर इज्जत खोओगे
रे मन शाश्वत मुक्ति चाहोगे तो लिंग के लिए समर्पित हो ।
हे अखंड परिपूर्ण घनलिंगगुरु चेन्नबसवेश्वर शिव साक्षी होकर / 2261[1]

नाट्यशाला में नाचती नर्तकी की झंकार सुन
बासी बर्तन माँजनेवाली
नकटी महरी गुनगुनाने जैसे
मयूर लास्य से मुदित हो कुत्ता पूँछ हिलाने के जैसे
कोयल की मधुर कूक सुनकर पंख बिखेरते मुर्गा जैसा है।
निश्चय रहित की भक्ति । वह नाले के कीड़े जैसा है देख
हे अखंड परिपूर्ण घनलिंगगुरु चेन्नबसवेश्वर शिव साक्षी है। / 2262 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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