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मादार चेन्नय्या (1100)

पूर्ण नाम: मादार चेन्नय्या
वचनांकित : छेनी, खड्ग, हथौड़े के दास न हो जान लो निजत्माराम, रामना
कायक (काम): मोची (Cobbler)

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करनी और कथनी सिद्धांत हो तो निम्न कुल का सूतक नहीं।
अच्छी बात बोलते हुए, करनी अधम हो तो
वही निरंतर मालिन्य है।
चोरी, व्यभिचारी में सही मार्ग न पहचान कर
भ्रष्ट होकर जीनेवाले
आप अच्छे कुलवाले कहेंगे भी कैसे?
आचार ही कुल, अनाचार ही निःकुल,
इन दोनों को विवेक से समझना चाहिए।
छेनी, खड्ग, हथौड़े के दास न हो
जान लो निजत्माराम, रामना। / 1930 [1]

जाति से अस्पृश्य मादार चेन्नय्या मूलतः चोळ देश के थे। राजा करिकाळचोळ की राजधानी कांचीपुर के निवासी था। इनका कायक था राजा के घोड़ों को घास देने का। ये गुप्त शिवभक्त थे। इन्होंने भगवान शिव को माण्ड पिलाया था, यह बात काव्य-पुराणों में वर्णित है। इस पुराण कथा से व्यक्त होता है कि शिवप्रेम के लिए वृत्ति, जाति, स्तर मुख्य नहीं, भक्ति मुख्य है। कल्याण आने पर शरणों के विशेष गौरव के पात्र बने। यहाँ मोची का कायक करते हैं। इनका वचनांकित है - कैयुळिकत्ति अडिगूटक्कडियागबेड अरि निजात्मराम रामना' इनके 10 वचन उपलब्ध हैं। अपने अंकित और वचन में अपने कायक की परिभाषा का उपयोग कर चेन्नय्या ने वंश जाति की चर्चा को प्रमुखता दी है। उनका कथन कि किसी भी जातिवंश का हो, ज्ञान हो तो तत्वानुभावी है, अज्ञान में हो तो मलमाया संबंधी है।'

वेदशास्त्र पढ़ेगा तो ब्राह्मण है।
वीरतापूर्ण कार्य से क्षत्रिय है।
व्यापार में जो लगा है वह वैश्य है।
कृषिकार्य करनेवाला शूद्र है।
इसप्रकार जातिगोत्रों में श्रेष्ठ
नीच और श्रेष्ठ दो कुल है न कि
अठारह कुल है।
ब्रह्म को जाननेवाला ब्राह्मण
सर्व जीवहत कर्म करनेवाला चमार है।
इस उभय को जानो, भूलो मत।
छेनी, खड्ग, हथौड़े के अधीन न हो
जानो निजात्मराम, रामना। / 1931[1]

शुक्ल, शोणित, मज्जा, मांस, भूख, प्यास,
व्यसन, विषयादि में एक ही हैं।
कृषि व्यवसाय तरह-तरह के होते हैं,
लेकिन ज्ञान पाने की आत्मा सिर्फ एक है।
किसी भी कुल के क्यों न हो, ज्ञान पाने से ही
पर-तत्व की अनुभूति मिलेगी,
भूलने से मायामल संबंधी होगा।
इस प्रकार दोनों को समझो मत भूलो
छेनी, खड्ग, हथौड़े के अधीन न हो।
जान लो निजात्माराम रामना। / 1932[1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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