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मेदर केतय्या (1160)

पूर्ण नाम: मेदर केतय्या
वचनांकित : गवरेश्वर

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सद्भक्त के लिए, सुख भी मान्य है, दु:ख भी मान्य है,
गरीबी हो या दौलत, दोनों मान्य हैं,
ऐसा न कहे तो, उस भक्त को ही नुकसान है;
जंगम को प्रामाणित कर,
सामनेवाले को प्रसन्न करने के लिए,
अपने शरीर की रक्षा करे तो,
तीर्थ प्रसाद के लिए, वह तभी दूर होगा, हे गवरेश्वर! / 1961 [1]

केतय्या बाँस की टोकरी बुनने का कायक करते थे। जन्मस्थान बेलूर के समीप उळविबेट्ट है। पत्नी का नाम सातव्वा है। ‘गवरेश्वर' वचनांकित में रचे 11 वचन मिले हैं। उनमें समकालीन शरण स्तुति, अपने कायक की रीति, नीति और उसका महत्व और उसके द्वारा प्राप्त लिंगांग सामरस्य का सुख निरूपित हैं।

मूलधन किए बिना लाभ कैसा?
निरीक्षणा के बिना परीक्षण कैसा?
गुरु के बिना लिंग कैसा?
ऐसी ढोंगी भाषा से मुझे तिरस्कार है!
देखो हे गवरेश्वर । / 1962 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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