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मोळिगे मारय्या (1160)

पूर्ण नाम: मोळिगे मारय्या
वचनांकित : निःकलंक मल्लिकार्जुन
कायक (काम): कश्मीर देश का राजा, लकड़ी बेचने का काम (Kashimir's King later became woodworker in Kalyana)

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पत्थर मिट्टी काष्ठ में भगवान् है समझकर
दर-दर भटकनेवाले भैया सुनो,
वह इधर-उधर स्थापित प्रतिष्ठा का संकेत है,
जो शब्दातीत है उसे समझो।
वह मनाश्रित जहाँ है वहाँ रहेगा,
नि:कलंक मल्लिकार्जुन। / 1981 [1]

कश्मीर देश का राजा महादेव भूपाल ही मोळिगे मारय्या हैं। उनकी पत्नी गंगादेवी ही महादेवी हैं। वे कल्याण की महिमा सुनकर राज्य त्यागकर कल्याण आते हैं। मारय्या-महादेवी के नाम से वे लकड़ी बेचने का कायक करते शरण जीवन बिताते रहते हैं। कायकनिष्ठा की इनकी कथा शून्य संपादन के एक अध्याय में निरूपित हैं। ‘निःकलंक मल्लिकार्जुन' वचनांकित में रचे मारय्या के 808 वचन प्राप्त हुए हैं। मारय्या के वचन वैविध्यमय और तात्विक, धार्मिक, सामाजिक, आनुभाविक वस्तु-विषयों से युक्त होकर वे मारय्या की विद्वत्ता, आध्यात्मिक धारणा, आनुभाविक पहुँच और सामाजिक सरोकार से साहित्यिक संपन्नता को दिखाते हैं।

तन से पूजा मन में सांसारिकता
तो कैसी यह लिंगपूजा बताओ?
तो कैसी यह जंगम पूजा बताओ?
ऐसे निर्लज्ज नकटे को मत दिखाओ
नि:कलंक मल्लिकार्जुन / 1983 [1]

बंदी के जाने के बाद फिर लड़ाई की बात क्यों ?
अकलमंद होने पर फिर पूछे क्यों किसी को ?
ज्ञानी होने पर फिर जीना क्यों भवसंसार में?
यह बाँस के अंतर्गत अग्नि की भाँति है।
इसमें क्या चतुराई, नि:कलंक मल्लिकार्जुन ? / 1984 [1]

विष रहित सर्प से कोई डरते हैं क्या?
शस्त्र रहित सैनिक गर्जन करेगा तो डरेंगे कोई?
इष्टलिंग के बाहरी आकार की बात करेंगे तो
सीधा प्राणलिंगी बनेगा क्या?
वह निर्णय नहीं, निःकलंक मल्लिकार्जुन। / 1985 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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