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मुक्तायक्का (1160)

पूर्ण नाम: मुक्तायक्का
वचनांकित : अजगण्णतंदे

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ज्ञान को जबड़े में रखकर चबा रहा है मर्त्यलोक सारा।
इससे ज्ञान न बच सकने से नष्ट हुआ सारा लोक।
मैं कैसे जी सकें भैया?
तम और प्रकाश में संदेह करनेवाली हूँ मैं।
मेरी आँखों को बाँधकर दर्पण को दिखाने के समान हुआ
तुम्हारा योग अजगण्णा। / 1324 [1]

मुक्तायक्का अनुभावी शरणी थीं। इनकी मायका लक्कुंडी और ससुराल मसळिकल्लु है। शरण अजगण्णा इनके भाई तथा गुरु भी थे। भाई के लिंगैक्य होने के संदर्भ में दुःखी मुक्तायक्का को समझाने अल्लमप्रभु आते हैं। अल्लम मुक्तायक्का की ज्ञानचक्षु खुलवाने के द्वारा सांत्वना देते हैं।

मुक्तायक्का के ‘अजगण्णतंदे' अंकित में रचे 32 वचन मिले हैं। ये वचन अजगण्णा के बिछुड़ने के संदर्भ के शोकगीत जैसे हैं। ये अल्लम प्रभु के साथ अध्यात्म-संवाद से निकले अनुभावगीत हैं। शून्य संपादन में यह संवाद बहुत प्रसिद्ध है।

फूल में छिपे परिमल के समान
सूर्य में छिपी अग्नि के समान
चंद्रमा में छिपे षोडश कला के समान
ध्वनि में छिपी वायु के समान
बिजली में छिपी बड़ी तेजोमय कांति के समान
योग को रहना चाहिए।
मेरे अजगण्णा पिता का योग ऐसा है। / 1325 [1]

हाँ, हाँ, शिवशरणों की महिमा किसी को न दीखती।
लोहे के पिये पानी के समान, कड़ी धूप के खाये हल्दी के समान
दीपशिखा में छिपे कर्पूर के समान,
र्निवात से गले लगी वायु के समान
जो भाव है, उसे बोलकर समझाना क्या संभव है?
समझने पर भी समझ में न आती।
स्मरण करने जाय तो मन को छूता नहीं।
मेरे अजगण्णा पिता में समायी आपकी महिमा के लिए
नमः नम: कहती रहूँगी। / 1326 [1]

जो अपने आपको जानता है,
उसे अपना ज्ञान ही गुरु है।
ज्ञान सहज होकर वह विस्मृति नष्ट हो तो
देखी दृष्टि नष्ट हो जाती है, वही गुरु है।
जब दृष्टि नष्ट ही गुरु हो
तब स्पर्श करके बतानेवाले नहीं तो क्या हुआ?
सहजस्थित जो अपने में बसी है उसकी
निर्णय निष्पत्ति ही गुरु है।
आप खुद गुरु होने पर भी गुरु का मार्ग दर्शन चाहिए
मेरे अजगण्णा जैसे। / 1327 [1]

बुरे शब्द बोलना नहीं चाहिए।
बुरी चाल चलना नहीं चाहिए
बोले तो क्या, न बोले तो क्या ?
व्रत से न चूके तो वही महाज्ञान का आचरण है।
कहूँगी, अजगण्ण पिता। / 1329 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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