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निजगुणयोगी

पूर्ण नाम: निजगुणयोगी
कायक जंगम
वचनांकित : निजगुणयोगी

जब तक मैं हूं तब तक तूम हो माया,
मैं नहिं तो तुम नहिं।
तुम और मैं का भेद मिटने पर प्राप्त होगा आनंद
निजगुणयोगी। / १८१४ [1]

निजगुणयोगी आप बसवपूर्व युग के शरण थे। आपका स्थान 'चिम्मलगी'। चंदिमरस इनके शिष्य थे। निजगुणयोगी' वचनांकित में वचन और स्वरवचन रचे हैं। अब तक प्राप्त 16 वचनों में शिवयोग का प्रतिपादन ही मुख्य है। कुछ वचन सूत्र रूप कथन होकर, उनमें रहस्यानुभूति घनीभूत हुई है। इनके महान व्यक्तित्व की प्रशंसा कई शरणों ने की है।

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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