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निवृत्ति संगय्या (1160)

पूर्ण नाम: निवृत्ति संगय्या
वचनांकित : निवृत्ति संगय्या

सचराचर के लिए इच्छा ही प्राण है
सचराचर के चौरासी जीव में
बिना आशा के चलनेवाले लिंगांगी को दिखाओ।
आशाया बद्धयते लोक: कर्मणा बहुचिंतया।
आयू: क्षीणं न जानाती वेणूसुत्रं विधीयते ॥
अत: आशा का तिरस्कार कर
निराशा में चलनेवाले लोगों को योग्य मानता हूँ
निवृत्ति संगय्या। / १८१५ [1]

इस वचनकार के बारे में कुछ भी नहीं मिलता। इनके तीन वचन मिले हैं। अंकित भी 'निवृत्ति संगय्या' है। शरण को परधन, परअन्न, परस्त्री का मोह छोड़ देना चाहिए। यदि चातृवर्णवाले शिवभक्त बने तो अपने पूर्वाश्रम की जाति छोड़ देनी चाहिए। उन्होंने कहा है, आशा का धिक्कार कर आशा रहित होकर चलनेवाला ही सच्चा लिंगांगी है। संस्कृत उल्लेखों को अधिकता से उपयोग करने से कहा जा सकता है कि वे विद्वान थे।

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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