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प्रसादि भोगण्णा (1160)

पूर्ण नाम: प्रसादि भोगण्णा
वचनांकित : चेन्नबसवण्णप्रिय भोग्मल्लिकार्जुन लिंग

कोई यह कहे की तत्वों द्वारा आधार को पा लिया
वह बंदर के दर्पण के समान, जैसे वह नाचे
उसका अलग कोई गुण नहिं ।
गीरि के गह्वर में बुलाने की प्रतिध्वनि जैसे
जैसा विश्वास है
चन्नबसवण्णप्रिय भोग मल्लिकार्जुन लिंग वैसा है । /१८२६ [1]

प्रसादि भोगण्णा (1160) - इनके बारे में भी जानकारी नहीं। इनके ‘चेन्नबसवण्णप्रिय भोग्मल्लिकार्जुन लिंग' वचनांकित के 103 वचन मिले हैं। ये वचन तत्वबोध प्रधान हैं और इनमें शरण स्तुति, भक्त का लक्षण, "लिंगाग सामरस्य का स्वरूप", वेद आगम शास्त्र और पुराणों का निराकरण आदि का विवरण है। कुछ वचन सुदीर्घ होकर गद्यगुण से युक्त है।

भक्ति जड़ है, विरक्ति पेड़ है, फल ही ज्ञान है।
परिपक्व स्थिति में आने पर ही अवधिज्ञान है।
डंडी से छुटना ही परमज्ञान है ।
आस्वादन ही अंतरिक ज्ञान है ।
सुख तन्मय होना ही दिव्य ज्ञान है ।
दिव्य तेज का न कांतीहीन ही परिपुर्ण ज्ञान है ।
बह महत्‌ का आवास कहने की कोई आवश्यकता नहिं ।
चन्नबसवण्णप्रिय भोग मल्लिकार्जुन लिंग अप्रमाण होने से। /१८२७[1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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