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संगमेश्वरद अप्पण्णा (1160)

पूर्ण नाम: संगमेश्वरद अप्पण्णा
वचनांकित : बसवप्रिय कूडलचेन्न संगमदेव
कायक (काम): पंडित

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तिथि-वार मैं नहीं जानता, लग्न-विलग्न मैं नहीं जानता,
इसे जानकर सात वार, अठारह कुल हैं, कहते हैं।
हम इसे नहीं जानते हैं,
रात, एक वार, दिन एक वार,
भवि एक कुल है, भक्त एक कुल है,
हम इतना ही जानते हैं,
बसवप्रिय कूडलचेन्नसंगमदेव। / 2047 [1]

इनके नाम के पीछे ‘संगमेश्वर' (कूडलसंगम) होने से लगता है ये उस प्रदेश के होंगे। इनके वचनों में संस्कृत शब्दों का भरमार होने से लगता है कि ये पंडित रहे हैं।

‘बसवप्रिय कूडलचेन्न संगमदेव' वचनांकित में रचे 102 वचन इनके मिले हैं। सभी तात्विक वचन हैं। अन्यमत खण्डन और शिव पारम्य स्थापन के लिए विशेष स्थान दिया गया है। शून्य सिंहासन, अनुभव मण्डपों का उल्लेख, प्रभुदेव के कल्याण आने का प्रसंग और भोजन का संदर्भ आदि का वर्णन विशेष महत्व रखता है। सुदीर्घ गद्य के लक्षणवाले वचन-रचना के साथ कुछ मुक्तक रूप के वचन भी समाविष्ट हैं।

भिक्षा माँगकर भी,
आपके भक्तों की सेवा करने का भाग्य,
- देना प्रभु,
मन, , काया से आपके शरणों का मैं दास बना रहूँ,
- ऐसा करो प्रभु,
अधिक क्या कहूँ, लिंगजंगम को देता रहूँ,
- ऐसा करो प्रभु,
हे, बसवप्रिय कूडलचेन्नसंग। / 2048 [1]

ईप्सित वस्तु प्राप्त हुई हो जैसे
निधि निधान घर आए हों जैसे
सुगंध को ढूंढते हुए आये भ्रमर जैसे
चिंतामणि का पुतला चलना सीखा हो जैसे
बसवप्रिय कूडलचेन्नसंग में,
प्रभुदेव का आना ऐसा दिखाई दे रहा है,
देखो, संगनबसवण्णा। / 2049 [1]

भक्त भक्तों के घर आये तो,
अपने घर में जैसे रहते हैं, वैसे ही रहना चाहिए,
न घबराते, न झिझकते हुए, शुद्ध भाव में रहना चाहिए,
आप मालिक होकर, रंक जैसा रहें तो
बसवप्रिय कूडलचेन्नसंग, दाँत तोड़ेगा। / 2050 [1]

चारों वेद पढ़ने से क्या होगा?
शास्त्रों को लगन से सुनने से क्या होगा?
शिवज्ञानहीन क्या जाने भक्ति पथ को?
‘अलोड्यं च चतुर्वेदी सर्वशास्त्र विशारदः ।
शिवतत्त्वं न ज्ञानाति, दर्वी पाकरसं यथा ।।’'
क्षीर में रखी कलछी, रुचिस्वाद क्या जाने ?
पढ़ने का मर्म, हमारे (मोची) चेन्नय्या,
मड़िवाळय्या, डोहर (ढोर) कक्कय्या ही जानते हैं,
बसवप्रिय कूडलचेन्नसंगमदेव। / 2051 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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