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षण्मुखस्वामी (1639- 1711)

पूर्ण नाम: षण्मुखस्वामी
वचनांकित : अखण्डेश्वर
कायक (काम): विरक्तमठ के अधिपति

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बसव का नाम कामधेनु है देखो
बसव का नाम कल्पवृक्ष है देखो
बसव का नाम पारसमणि है देखो
बसव का नाम संजीवनी मूलिका है देखो
ऐसे बसवनामामृत
मेरी जीभ में भरकर बाहर भी छलकते, मन भरा था।
वह मन भरकर बाहर छलकते सकल इन्द्रियों में भरा था।
उन सकल करणेंद्रियों में भरकर छलकते ।
सर्वांग के रोमरंध्रों को छेदन करने के कारण
बसवाक्षर रूपी जहाज में चढ़कर
बसव बसवा बसवा बोलते
भव सागर को पार किया मैंने, अखंडेश्वरा। / 2480 [1]

षण्मुख स्वामी जी बसवोत्तर युग के और एक श्रेष्ठ वचनकार थे। इनके पिता का नाम मल्लशेट्टप्पा और माँ का नाम दोड्डमांबे । ये गुल्बर्गा जिला जेवरगी के थे। अखण्डेश्वर इनके गुरु थे। मूलतः भक्त थे। अनंतर ये जेवरगी विरक्तमठ के अधिपति बने। लोक संचार करते धर्मबोध करते थे। जीवरगी में ही ये लिंगैक्य हुए।

‘अखण्डेश्वर’ वचनांकित में इनके रचे 717 वचन प्राप्त हैं। अलावा इसके इन्होंने चौपदी में 41 ‘अखण्डेश्वर जोगुळ (लाली) पद', परिवर्धिनी षट्पदी में 7 ‘पंच संज्ञा पद' और भामिनी षट्पदी में ‘निराळ सद्गुरु स्तोत्र' रचे हैं।

वचन, स्थलों के अनुसार संकलित किये गये हैं। इस कृति का नाम है। ‘शून्य निरालंब शरणन अरुहिन षट्स्थल वचन' (शून्य निरालंब शरण के ज्ञान का षट्स्थल वचन)। यह प्रधानत: षट्स्थल तत्व विरूपक ग्रंथ है। अब तक रूढ़िगत होकर चले आये इस तत्व को परंपरा के मार्ग पर ही अधिक व्यवस्थित करके, उतना ही स्पष्ट रूप में कहते आये हैं। अनुभाव-तत्व-साहित्य ये तीनों इनके वचनों में सम्मिलित हैं।

केले के पत्ते पर घी का लेपन जैसे ।
मधुर वचन कहता रहा
परंतु आचरण में न लाया
इसलिए मैं बोल में चूका, चाल में चूका, जड़देही मुझ पापी को
स्वामी अखंडेश्वर लिंग ने
सपने में भी दर्शन नहीं दिया। / 2481 [1]

बीज की आड़ में छिपे अंकुर
बाहर दिखने जैसे
बादल की आड़ में छिपी
बिजली के स्फुरण जैसे
मेरे मन के मध्य में छिपे महाघन तत्त्व
अपनी लीला से स्वयं उदय होने से
आपकी आदि-अनादि का स्वरूप देखा मैंने, अखंडेश्वरा। / 2482 [1]

तालाब का पानी, शस्य का फूल, पेट के लिए अन्न रहने पर
बात-बात में ईश्वर का स्मरण हो तो
जड़ जीवियों का ऋण क्यों होना, बोलो
शिवध्यान, शिवचिंता, भिक्षाहार में मग्न
एकांतवासी बनाओ मुझे, अखंडेश्वरा। / 2483 [1]

करना नहीं चाहिए, करना नहीं चाहिए
मानहीन, मतिभ्रष्टों का संग,
करना नहीं चाहिए, करना नहीं चाहिए
पाश में फंसे, पीड़ा उठाते जीवों का संग
करना नहीं चाहिए, करना नहीं चाहिए ।
झूठे पाखण्डी, झूठे मूर्खा का संग।
अगर करेंगे तो, भव में कष्ट-विनष्ट के बिना
मुक्ति का प्रयोजन नहीं मिलेगा, अखंडेश्वरा। / 2484 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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