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सिद्धरामेश्वर (1160)

पूर्ण नाम: सिद्धरामेश्वर,
वचनांकित : कपिलसिद्ध मल्लिकार्जुन, त्रिविधियों में अंकित योगीनाथ
कायक (काम): कर्मयोगी

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तन से दासोह कर गुरुप्रसादि बना बसवण्णा।
मन से दासोह कर लिंगप्राणि बना बसवण्णा।
धन से दासोह कर जंगमप्राणि बना बसवण्णा।
इस प्रकार त्रिविध से दासोह कर,
सद्गुरु कपिलसिद्धमल्लिकार्जुन
आपका शरण स्वयं प्रसादि बना बसवण्णा। / 1015 [1]

12वीं शती के प्रथम श्रेणी के वचनकारों में एक हैं। इनके जीवन के बारे में अनेक आधार वचन, काव्य, शिलाशासन, परंपरा में सामग्री मिलती हैं। सिद्धरामेश्वर का जन्मस्थान सोन्नलिगे (आज का महाराष्ट्र का सोलापुर) है। पिता का नाम । मुद्दगौड़ा है और माँ का नाम सुग्गले। ‘धूळिमाकाळ' उनका गृहदेवता है। रेवणसिद्ध के वर से पैदा होने से इनका नाम ‘धूळिमाकाळ' रखा गया था। बाद में नाथसिद्ध संप्रदाय के होने से सिद्धराम नाम से प्रसिद्ध हुए। बाल्य में से ये मुग्धभक्त थे। गाय चराने का कायक इनका था। श्रीशैल जाकर मल्लिकार्जुन के दर्शन पा लिये। सोन्नलिगे लौटकर देव मंदिर की स्थापना कर उस आवरण को योग रमणीय क्षेत्र नाम दिया। लिंग स्थापना और सभी लोगों की सुखसुविधा के लिए तालाब बनवाने के कायक में लगे रहे और कर्मयोगी कहलाये। अल्लम प्रभुदेव उन्हें कल्याण ले जाकर चेन्नबसवण्णा से इष्टलिंग दीक्षा दिला दी। अनुभव मण्डप की गोष्ठी में भाग लेकर महाशिवयोगी बने। कल्याण क्रांति के बाद सोन्नलिगे लौटे और वहीं पर लिंगैक्य हुए।

‘सिद्धराम वचन’, ‘स्वर वचन', 'बसवस्तोत्र त्रिविधि’, ‘अष्टावरण स्तोत्र त्रिविधि’, ‘संकीर्ण त्रिविधि' आदि वैविध्यमय रचनाएँ सिद्धरामेश्वर ने रची हैं। वचन और स्वर वचनों में उनका वचनांकित ‘कपिलसिद्ध मल्लिकार्जुन' हो तो त्रिविधियों में अंकित योगीनाथ है। अब तक उनके 1162 वचन प्राप्त हुए हैं। उन। वचनों में वैयक्तिक जीवन की बातें, धर्म तत्वजिज्ञासा और सामाजिक आस्था प्रमुख रूप में हैं।

शरीर रूपी साँप की पिटारी में मन रूपी सर्प आवृत्त हो तो
उसे आश्रय न देकर
उस साँप को हटाकर
शिवलिंग को स्थापित करनेवाले
श्री गुरु, शरणु शरणु जैसे वाक्य में
आकार चतुष्ट्य को आनंद में रखा,
एकोरुद्र शिष्ट कपिलसिद्धमल्लिकार्जुन ने। / 1016 [1]

तामसिकता से तुम्हारा ध्यान करनेवालों को
तुम तामस पद दोगे।
सेवाकर तुम्हारा लगातार ध्यान करनेवालों को
कारुण्य पद दोगे स्वामी
हे अनादि मूर्ति कपिलसिद्धमल्लिकार्जुन। / 1017 [1]

अपने से बनी स्त्री अपने सिरपर चढ़ी थी
अपनेसे बनी स्त्री अपनी गोदपर चढ़ी थी
अपने से बनी स्त्री ब्रह्मा की जोभपर चढ़ी थी
अपने से बनी स्त्री नारायण की छातीपर चढ़ी थी
इसीलिए, स्त्री केवल स्त्री नहीं, स्त्री राक्षसी नहीं
स्त्री साक्षात् कपिलसिद्धमल्लिकार्जुन है देखो। /1018 [1]

जानबूझकर विषयासक्ति में पड़नेवाला अनुभावी है क्या?
विषयासक्ति नष्ट होकर आनंद में पड़नेवाला अज्ञानी है क्या ?
ज्ञानी बनने के बाद विषयवासना मिटनी चाहिए
विषयवासना नष्ट होने के बाद
बालचंद्रधर को कपिलसिद्धमल्लिकार्जुन बनना ही चाहिए। / 1019 [1]

ज्ञानी बन गया मैं ज्ञानी बन गया कहते हुए
कई लोग नष्ट हो गये अहंकार में।
मैं ज्ञानी न बना, मैं ज्ञानी न बना कहते हुए
कई लोग पड़ गये विस्मृति में ज्ञानी बना,
नहीं बना कहना ज्ञान का उलझन है।
जानना ही ज्ञान, भूलना ही विस्मृति
इस उभय को जानकर भी
अनजान-सा रहे तो
वह नळिनाक्षनुत
कपिलसिद्धमल्लिकार्जुन स्वयं ही है। / 1020 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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