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सोडुळ बाचरस (1160)

पूर्ण नाम: सोडुळ बाचरस
वचनांकित : सोडुळ
कायक (काम): राजा बिज्जल के राजमहल के करणिक

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बड़े-बड़े वीरों को नष्ट किया सुवर्ण ने,
बड़े-बड़े वीरों को नष्ट कर दिया स्त्री ने,
बड़े-बड़े वीरों को नष्ट कर दिया मिट्टी ने,
सुवर्ण देखने के बाद, वीर, वीर न रहा,
स्त्री को देखने के बाद, वीर वीर न रहा,
मिट्टी को देखने के बाद वीर वीर न रहा,
स्त्री, सुवर्ण, मिट्टी रूपी धूल जगत् की आँखों में डालकर,
तुम्हारे स्मरण का मौका ही खो गया,
हे मुक्कण्ण, सोडळ गरळधर! / 2110 [1]

सोडुळ बाचरस बसवण्णा के आत्मीय थे और वे राजा बिज्जल के राजमहल के करणिक थे। ये सौराष्ट्र सोमेश्वर के भक्त थे। बसव-पुराण, भैरवेश्वर काव्य के कथामणिसूत्र रत्नाकर आदि कृतियों में इनके जीवन के संबंध में विवरण मिलते हैं। सोडुळ अंकित में रचे इनके 102 वचन प्राप्त हैं। तत्व विवेचन, नीतिबोध, अन्यमत-अन्यदेव दूषण, शिव भक्ति निष्ठा आदि वचनों में अभिव्यक्त हैं। भाषा प्रयोग और निरूपण शैली दूसरों से भिन्न है।

खाना खाकर, जो बूढे हो गये सब, क्या योगी है?
खाने के लिए रोनेवाला, क्या योगी है?
व्यसन के लिए तड़पनेवाला क्या योगी है?
आधिव्याधि ग्रस्त क्या योगी है?
इन्हें योगी कहे तो, नाक काट दूंगा!
योगियों का योगी है शिवयोगी,
हे सोडळ, सिद्धराम ही है, एक शिवयोगी। / 2112[1]

मेरी कायारूपी सिंहासन में,
प्राण रूपी लिंग की स्थापना कर
ध्यान रूपी हाथ से छूकर पूजा करते हुए,
धीरे-धीरे, चारों ओर के संसार को नष्ट करके,
'तू' और 'मैं' का भेद मिटाते हुए,
महादानी सोडळ में लिंगैक्य हो गया। / 2113 [1]

लिंगदेव ही कर्ता हैं,
शिवभक्त ही श्रेष्ठ हैं,
न मारना ही धर्म है,
अधर्म से जो मिले उसे न चाहना ही व्रत-नियम है,
बिना लोभ के करना ही व्रत है,
यही है सत्पथ! बाकी सब मिथ्या है, देखो,
देवराय सोडळ! / 2125 [1]

‘शिव' न कहते हुए जो पढ़ता है वह शुक का पढ़ना है,
‘शिव' तुम्हारी पूजा जहाँ नहीं होती है, वह घर व्यर्थ है,
'शिव' तुम्हें न देखनेवाली आँखें, मयूर पंख की आँख जैसी है,
'शिव' तुम्हारी स्तुति न करनेवाला मुँह, सेंध के मुँह जैसा है,
शिव, तुम्हारी प्रशंसा न करनेवाली जीभ
स्नानगृह की नाली में उत्पन्न कीड़े के समान है,
शिव, तुम्हें सिर न झुकानेवाला, कर्मी शूलपर झूलते शव समान है,
शिव, तुम्हें स्मरण न करनेवाला शरीर, संदेह भरा है।
शिव तुम्हारा भक्त जो नहीं है, उसका,
संपत्ति, विद्या, बुद्धि, कुल, धन,
शव के शृंगार समान मूल्यहीन है।
ऐसे मनुष्य का क्या प्रयोजन ?
इस कारण, ऐसे भव की भयानकता में न जाकर,
तुम्हारी शरणों में आया हूँ।
हे सोड्डळदेव, अब यह भवबंधन, मुझे नहीं चाहिए। / 2126 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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