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सुंकद बंकण्णा (1160)

पूर्ण नाम: सुंकद बंकण्णा
वचनांकित : बंकेश्वर लिंग
कायक (काम): कर वसूल करने का कायक

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अंग में रहकर, सतर्क रहकर
भाव में रहकर, भव छेदकर,
सुख में रहते हुए, प्राण निग्रहकर;
सभी भोगानुभव करते हुए, भोग से विरागी बनकर;
बंकेश्वरलिंग को देखकर भी,
अनदेखा करो, मनघनतत्त्व में स्थिर रहकर। / 2102 [1]

पुराणों में उल्लेखित बंकण्णा कर वसूल करने का कायक करते थे। ‘बंकेश्वर लिंग' वचनांकित में रचे 108 वचन प्राप्त हुए हैं। कायक की परिभाषा का उपयोग कर तत्व विवेचन करना इन वचनों का मुख्य आशय है। वचनों का विभाजन कई स्थलों के अंतर्गत किया गया है। वचन आकार में छोटे होने पर भी सुन्दर हैं। कुछ वचन उलटबासीपरक हैं। व्यापार-व्यवस्था, कर-व्यवस्था, वाहनपरिवहन संबंधी विवरणों से युक्त वचन सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व रखते हैं।

आहार के लिए जो आतुरता होती है,
निद्रा के लिए जो आतुरता होती है,
स्त्री के लिए जो आतुरता होनी है,
वही आतुरता, लिंग के लिए होना चाहिए।
शिवलिंग में मोह लगाने पर,
अपने आपको दे डालेगा, चेन्नबंकनाथदेव! / 2103 [1]

तुम, इन्द्रियों से लड़कर हारते हो,
मन महत् में विलीन किए हुओं से, मात्सर्य न करो।
सभी प्राणियों में कमी न ढूंढो।
अपना मन जब प्रमाणित कर लेता है तो, तू-मैं का भेद न करो;
बंकेश्वरलिंग को अपना लो।। / 2104 [1]

क्षयकारण नामक नगर में, लयकारण नाम का राजा,
अपव्ययी प्रधान, मदोन्मत्त ग्रामसेवक,
ऐसा राजा, विस्मरण के महाराज्य पर शासन करता हो तो,
उसके चरणों में पड़ते हुए प्रणाम कर, सभी डरते,
बंकेश्वरलिंग को न देखने और समझने के कारण। / 2105 [1]

मन बुद्धि चित्त अहंकार , ये अपने लिए दुश्मन होते हैं;
निर्मल सुचित्त, दिव्यज्ञान ही अपने लिए प्रिय होते हैं;
भूल जाओ तो दुश्मन;
अपने आपको समझो तो, अपना परिस्पंद दिव्यज्ञान है,
इस तरह उभय ज्ञान को समझो बंकेश्वरलिंग में। / 2107 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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