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तेलुगेश मसणय्या (1160)

पूर्ण नाम: तेलुगेश मसणय्या
वचनांकित : तेलुगेश्वर
कायक (काम): गोपालन

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काम सदृश स्वयं सुंदर होने पर
सभी कामिनियों को पसंद होनी चाहिए।
बुलाकर दान देनेवाला दानगुणी होने पर
याचक जन को उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।
वीर हो तो शत्रु को प्रशंसा करनी चाहिए।
मूर्ख हो तो अपनी ही प्रशंसा करेगा।
मेरे देव तेलुगेश्वर का वह भक्त हो तो
भगवान भी पसंद करेगा, जग भी प्रसंद करेगा। / 1791 [1]

मसणय्या गोपालन का कायक करते थे। इनके नाम के साथ ’तेलुगेश' शब्द जो जोड़ा गया है वह तेलुगु प्रदेश को सूचित करता है। तेल्लिगरु' (तेली) संस्थापित 'तेल्लिगेशलिंग' के बारे में भी हो सकता है। 'तेलुगेश्वर' वचनांकित के इनके सात वचन मिले हैं। ग्वाल की भाषा, वेष-भाषा, उसकी बाँसुरी का नाद आदि का वर्णन द्रष्टव्य है। शरण महिमातिशय पर उनकी बातें सुंदर व नूतन कल्पना से युक्त हैं।

गुरु करुणा प्राप्त करने का यही प्रमाण है कि
अंग पर लिंग का स्वायत होना चाहिए।
अंग पर लिंग स्वायत नहीं होने पर
खाली गुरु करुणा कैसे मिल पाएगी?
लिंग विहीन को गुरु करुणा मिल सकती है कहीं ?
वह बात नहीं सुनी जा सकती?
इस कारण, लिंग धारण करना ही सदाचार है
यदि नहीं तो, वह अनाचार है तेलुगेश्वर। / 1792 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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