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तोंटद सिद्धलिंगशिवयोगी (16वीं शती)

पूर्ण नाम: तोंटद सिद्धलिंगशिवयोगी
वचनांकित : महालिंगगुरु शिवसिद्धेश्वर प्रभु
कायक (काम): पीठाधिपति

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पका अन्न दुबारा कैसे पकाए भैय्या ? जली चीज़ दुबारा कैसे जलाए?
जला हुआ घड़ा पुनः मिट्टी में मिल सकता है क्या?
आग कर्पूर को निगलने के बाद मसि रहेगी क्या भैय्या?
शरण को लिंग निगलकर, लिंग को शरण निगलने के बाद
नदी में नदी के मिलन सा मिलकर
शुद्ध निर्मल बने हुए लिंगैक्य में
भिन्न अभिन्न भाव की कल्पना करनेवाले अज्ञानियों को ।
मुझे एक बार भी नहीं दिखाना,
हे महालिंग गुरु शिवसिद्धेश्वर प्रभु। / 2301 [1]

लिंगायत धर्म के इतिहास में तोंटद सिद्धलिंग शिवयोगी का नाम विशिष्ट है। अल्लमप्रभु संप्रदाय के शून्य पीठ सन पर आरोहण कर बसवादि शरणों से रूपायित षट्स्थल सिद्धांत का व्यापक रूप में प्रसार कर १२वीं शती के अनुभव मण्डप संस्कृति का पुनः स्थापित करनेवाले महापुरुष हैं। प्रसिद्धलिंगयति की जीवनी और साधना-सिद्धि वचन, काव्य और शिलाशासनों के साँचे में ढले हैं। कर्नाटक भर में जो इनके नाम पर समाधि, मठ और मंदिर हैं वे इनके प्रभाव को दर्ज करते हैं।

हाथ में फल रहने पर भी, पेड़ पर चढ़कर डाली झुकाकर,
फल तोड़ने वाले पागल जैसे।
अनादि मूल के स्वामी के
अपने करतल मनस्थल में स्थित होना न जानते हुए
होता अलग लिंग है, होता क्षेत्र अलग है कहकर
अनेक लिंगों के लिए तड़पते-छटपटाते
इन वेश्या की संतानों को।
न है गुरु, न है लिंग, न है जंगम, न है प्रसाद
इन्हें मुक्तिप्राप्ति तो कभी न होगी देखो,
हे महालिंग गुरु शिवसिद्धेश्वर प्रभु। / 2322 [1]

सिद्धलिंग का जन्म चामराजनगर के हरदनहळ्ळि गाँव में हुआ। पिता का नाम मल्लिकार्जुन और माँ का नाम ज्ञानांबा है। वे व्यापारी परिवार के थे। गोसल चेन्नबसवेश्वर इनके दीक्षा गुरु थे। कग्गेरे के बगीचे में छ: महीने तक अनुष्ठान करने के कारण इनका नाम 'तोंटद सिद्धलिंग' पड़ा। सिद्धगंगा आदि क्षेत्रों का दर्शनकर अंत में नागिणी नदी तट के एडयूर आकर दानिवास गाँव के चेन्नवीरप्पा ओडेयर के बनवाये कल्लुमठ में रहकर बोळबसव को निरंजन पीठाधिकार देकर वे निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर गये।

सती पति से लजायेगी तो संतान कैसे पायेगी?
लिंग से लजाये तो शरण कैसे बनेगा?
ये लज्जा का पाश क्या है?
संकल्प-विकल्प के संदेह में पड़नेवाला भ्रम ही लज्जा है भैय्या।
ठीक है या नहीं, ‘क्या हो', कैसे हो' इसप्रकार
कभी छूते, कभी छोड़ते, संदेह न करते
लज्जा विहीन होना चाहिए।
पति को न पहचानने वाली ही शर्माती है, लजाती है।
लिंग को न पहचाननेवाले ।
संकल्प-विकल्प जैसी संदेहभ्रांति में पड़ते हैं।
ये स्मृति, ज्ञान, भुलावे के भय का आवरण हटाकर,
ज्ञान की अनुभूति पाने में असमर्थ जड़ बुद्धिवालों को
लिंगानुभाव की अनुभूति बता सकते हैं क्या ?
हे महालिंग गुरु शिवसिद्धेश्वर प्रभु। / 2325[1]

बसवादि शरणों के वचन साहित्य का संग्रहन-संकलन और संपादन कार्य करने के लिए अपने शिष्यों को प्रेरित कर आप स्वयं वचन रचना करते वचन साहित्य परंपरा को आगे बढ़ाना आपका विशिष्ट योगदान है। हा सिद्धलिंगयति ने 70 वचनों की रचना की है। आपका वचनांकित है ‘महालिंगगुरु शिवसिद्धेश्वर प्रभु' । वे वचन 'षट्स्थल ज्ञानसारामृत' नामक कृति में संग्रहीत हैं। इसमें षट्स्थ ल तत्व-निरूपण ही प्रधान है।

पिता रहित, माता रहित, ।
नाम रहित, कुल रहित,
जनम रहित, मरण रहित
अयोनिसंभव होने से,
मैंने तुम्हें नि:कलंक लिंग कहा
हे महालिंग गुरु शिवसिद्धेस्वर प्रभु।। / 2336 [1]

तेल, बाती, ज्योति के स्पर्श करने से ज्योति बनेगी देखो,
सद्भक्ति, स्नेह, मोह से लिंग स्पर्श करने से,
उस भक्त के तन, मन सारे लिंग बने देखो,
लिंग में मन लगाकर और किसी में
न मन लगानेवाले निर्मोही को
माहेश्वर कहूँगा देखो,
महालिंग गुरु शिवसिद्धेश्वर प्रभु। / 2337 [1]

देह ही मंदिर, पाँव ही खंभ, शिर ही शिखर है देखो,
‘हृदयकमल कर्णिका वास' ही सिंहासन है,
महाघन पर-तत्त्व रूपी प्राणलिंग को साकार कर
परमानंदामृत जल से नहाकर
महादलपद्म पुष्प से पूजा करके
परम परिपूर्णरूपी नैवेद्य चढ़ाते हुए।
प्राणलिंग प्राण संबंधी
पूजा करता था मैं देखो,
महालिंग गुरु शिवसिद्धेश्वर प्रभु। / 2338 [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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